॥ पुरुषसूक्तः॥
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पुरुषसूक्त वेदों के अत्यंत प्राचीन और दिव्य सूक्तों में से एक है। यह ऋग्वेद के दशम मंडल तथा शुक्ल यजुर्वेद में सम्मिलित है। इस सूक्त में सृष्टि के आदिपुरुष “पुरुष” का वर्णन किया गया है, जिन्हें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का मूल कारण माना गया है। सहस्र सिर, सहस्र नेत्र और सहस्र चरणों वाले इस विराट पुरुष से ही देवता, मनुष्य, प्रकृति तथा समस्त लोकों की उत्पत्ति हुई मानी जाती है।
पुरुषसूक्त यज्ञ, सृष्टि-रचना तथा समाज की चारों वर्ण व्यवस्थाओं के आध्यात्मिक स्वरूप को भी दर्शाता है। वैदिक परम्परा में यह सूक्त अत्यंत पवित्र माना जाता है और शांति, समृद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिए इसका नियमित पाठ किया जाता है।
॥ अथ शुक्लयजुर्वेदीय पुरुषसूक्तः ॥
हरिः ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं सर्वत स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥१॥
पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम्।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति॥२॥
एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥३॥
त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत् पुनः।
ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि॥४॥
ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः॥५॥
तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम्।
पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये॥६॥
तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतः ऋचः सामानि जज्ञिरे।
छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत॥७॥
तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः।
गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः॥८॥
तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः।
तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये॥९॥
यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्।
मुखं किमस्यासीत् किं बाहू किमूरू पादा उच्येते॥१०॥
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ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥११॥
चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत।
श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत॥१२॥
नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँऽकल्पयन्॥१३॥
यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत।
वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः॥१४॥
सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः।
देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम्॥१५॥
यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥१६॥
॥ इति शुक्लयजुर्वेदीयपुरुषसूक्तं सम्पूर्णम् ॥
| संकट मोचन हनुमानाष्टक | सूर्याष्टकम |
सरल अर्थ (Summary Meaning)
इस सूक्त में बताया गया है कि यह सम्पूर्ण जगत एक ही विराट पुरुष से उत्पन्न हुआ है। भूत, भविष्य और वर्तमान – सब उसी पुरुष के स्वरूप हैं। उसी के मन से चन्द्रमा, नेत्रों से सूर्य, श्वास से वायु, मुख से अग्नि और नाभि से आकाश की उत्पत्ति हुई।
यज्ञ के माध्यम से देवताओं ने उसी पुरुष का यज्ञ किया, जिससे वेद, छन्द, पशु, मनुष्य तथा समाज की विभिन्न व्यवस्थाएँ प्रकट हुईं। यह सूक्त हमें यह सिखाता है कि सम्पूर्ण सृष्टि एक ही परमात्मा की अभिव्यक्ति है और सभी प्राणी उसी दिव्य सत्ता के अंश हैं।
पढ़ने की विधि
- शुद्ध मन से आसन पर बैठें।
- पहले “ॐ” का उच्चारण करें, फिर श्रद्धा से श्री सूक्तम् का पाठ करें।
- पाठ के अंत में माँ लक्ष्मी से मनोकामना प्रकट करें
लाभ (Benefits)
- मानसिक शांति और तनाव से मुक्ति मिलती है।
- सकारात्मक ऊर्जा और आत्मबल की वृद्धि होती है।
- यज्ञ, पूजा तथा विशेष अनुष्ठानों में इसका पाठ अत्यंत फलदायी माना गया है।
- ज्ञान, विवेक और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
- घर में शांति, समृद्धि और सौभाग्य का वास होता है।
- नकारात्मक शक्तियों और भय से रक्षा होती है।
कब पढ़ें (Best Time)
- अमावस्या, पूर्णिमा, सोमवार, गुरुवार तथा विशेष यज्ञ-अनुष्ठान के समय इसका पाठ विशेष फलदायी होता है।
- नियमित नित्य पाठ करने से श्रेष्ठ आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं।
