॥ लक्ष्मी माता आरती – ॐ जय लक्ष्मी माता ॥

लक्ष्मी माता की आरती हिंदू धार्मिक परंपरा में माता लक्ष्मी की आराधना और स्तुति के लिए गाई जाने वाली प्रसिद्ध आरतियों में से एक है। इस आरती में माता लक्ष्मी को जगत माता, शुभता और समृद्धि से जुड़े दिव्य स्वरूप के रूप में स्मरण किया गया है। आरती की पंक्तियों में भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी के संबंध, उनके विभिन्न स्वरूपों तथा गृहस्थ जीवन में सुख-संपन्नता और सद्गुणों के महत्व का वर्णन मिलता है।
इस आरती में क्षीरोदधि से माता लक्ष्मी के प्रकट होने और चौदह रत्नों का भी उल्लेख किया गया है। भक्त श्रद्धा और भक्ति भाव से माता लक्ष्मी की आरती का पाठ या गायन पूजा के समय कर सकते हैं।
॥ आरती श्री लक्ष्मी जी ॥
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशिदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
दुर्गा रुप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
शुभ-गुण मन्दिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
महालक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता।
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
लक्ष्मी माता की आरती का सरल भावार्थ
इस आरती में माता लक्ष्मी की महिमा का अलग-अलग रूपों में स्मरण किया गया है। आरती की शुरुआत में माता लक्ष्मी को भगवान विष्णु की आराध्या और जगत माता के रूप में नमन किया गया है।
“ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।”
इन पंक्तियों में भक्त माता लक्ष्मी की जय-जयकार करते हुए उनके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करता है।
“तुमको निशिदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥”
यहाँ माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु के दिव्य संबंध का स्मरण किया गया है। भक्त माता लक्ष्मी की सेवा और आराधना के भाव को व्यक्त करता है।
“उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।”
इस पंक्ति में माता के विभिन्न नामों और स्वरूपों का स्मरण करते हुए उन्हें जगत माता कहा गया है।
“सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥”
इसमें माता की स्तुति और उनके ध्यान का वर्णन किया गया है। सूर्य, चंद्रमा और नारद ऋषि के संदर्भ के माध्यम से माता की महिमा का गुणगान किया गया है।
“दुर्गा रुप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता।”
यहाँ माता लक्ष्मी के एक दिव्य स्वरूप का उल्लेख करते हुए उन्हें सुख और संपत्ति से संबंधित देवी के रूप में स्मरण किया गया है।
“तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता।”
इस पंक्ति में माता के व्यापक स्वरूप और शुभता प्रदान करने वाली शक्ति के रूप में उनका स्मरण किया गया है।
“जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता।”
यह पंक्ति घर में शुभता, सद्गुण और सकारात्मक पारिवारिक वातावरण के महत्व को दर्शाती है।
“तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।”
यहाँ जीवन की आवश्यकताओं और धार्मिक कर्मों में समृद्धि के महत्व को माता लक्ष्मी से जोड़ा गया है।
“शुभ-गुण मन्दिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता।”
इसमें माता लक्ष्मी के क्षीरसागर से प्रकट होने की धार्मिक परंपरा का उल्लेख मिलता है।
“रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता।”
इस पंक्ति में समुद्र मंथन से संबंधित चौदह रत्नों का संदर्भ दिया गया है और माता लक्ष्मी की महिमा का स्मरण किया गया है।
“महालक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता।”
अंतिम पंक्तियों में माता महालक्ष्मी की आरती श्रद्धा से गाने और उनके प्रति भक्ति भाव रखने का उल्लेख है।
आरती में वर्णित माता लक्ष्मी के स्वरूप
इस आरती में माता लक्ष्मी को केवल धन और संपत्ति से जोड़कर नहीं देखा गया है, बल्कि उनके कई धार्मिक और आध्यात्मिक स्वरूपों का उल्लेख मिलता है।
आरती में मुख्य रूप से:
- जगत माता के रूप में लक्ष्मी जी का स्मरण है।
- रमा और महालक्ष्मी नामों का उल्लेख मिलता है।
- भगवान विष्णु से उनके संबंध का वर्णन किया गया है।
- माता को शुभता और सुख-संपत्ति से संबंधित देवी के रूप में स्मरण किया गया है।
- क्षीरोदधि से प्रकट होने का संदर्भ दिया गया है।
- चौदह रत्नों से संबंधित धार्मिक प्रसंग का उल्लेख है।
- घर में सद्गुण और शुभ वातावरण से माता की उपस्थिति को जोड़ा गया है।
इस प्रकार आरती में माता लक्ष्मी के विविध धार्मिक स्वरूपों और उनके प्रति भक्तिभाव को सरल शब्दों में व्यक्त किया गया है।
लक्ष्मी माता की आरती का धार्मिक संदर्भ
हिंदू परंपरा में माता लक्ष्मी को भगवान विष्णु की अर्धांगिनी और समृद्धि, ऐश्वर्य तथा शुभता से संबंधित देवी के रूप में पूजा जाता है। समुद्र मंथन से माता लक्ष्मी के प्रकट होने का प्रसंग भी धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में प्रसिद्ध है।
इस आरती में भी क्षीरोदधि और चौदह रत्नों का उल्लेख इसी धार्मिक प्रसंग की ओर संकेत करता है। आरती की पंक्तियों में माता के प्रति श्रद्धा के साथ-साथ घर-परिवार में सद्गुण, सुख और शुभता की कामना का भाव दिखाई देता है।
आरती का पाठ करते समय इसके शब्दों के अर्थ और भाव को समझकर श्रद्धापूर्वक स्मरण करना भक्तिपूर्ण अनुभव को और अर्थपूर्ण बना सकता है।
लक्ष्मी माता की पूजा में आरती कैसे करें?
माता लक्ष्मी की पूजा में आरती सामान्य रूप से पूजा के अंतिम चरण में की जाती है। अपनी पारिवारिक और धार्मिक परंपरा के अनुसार विधि में अंतर हो सकता है।
एक सरल तरीका इस प्रकार है:
- पूजा स्थान को स्वच्छ करके माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- दीपक जलाकर माता लक्ष्मी का ध्यान करें।
- अपनी श्रद्धा के अनुसार पुष्प, नैवेद्य आदि अर्पित करें।
- पूजा के बाद “ॐ जय लक्ष्मी माता” आरती का पाठ या गायन करें।
- आरती के समय दीपक को श्रद्धापूर्वक माता के समक्ष घुमाएँ।
- आरती पूर्ण होने के बाद माता लक्ष्मी से परिवार के लिए सुख, शांति, सद्बुद्धि और शुभता की प्रार्थना करें।
पूजा की विधि अपनी पारिवारिक परंपरा या गुरु द्वारा बताए गए तरीके के अनुसार करना उचित है।
लक्ष्मी माता की आरती कब करें?
लक्ष्मी माता की आरती किसी भी दिन श्रद्धा के साथ की जा सकती है। विशेष अवसरों पर माता लक्ष्मी की पूजा और आरती का धार्मिक महत्व अधिक माना जाता है।
शुक्रवार
शुक्रवार का दिन माता लक्ष्मी की पूजा के लिए विशेष रूप से प्रचलित है। इस दिन कई परिवार अपनी परंपरा के अनुसार लक्ष्मी पूजा और आरती करते हैं।
दीपावली
दीपावली पर लक्ष्मी पूजन के दौरान माता लक्ष्मी की आरती की जाती है। इस अवसर पर परिवार के लोग एक साथ पूजा और आरती में शामिल हो सकते हैं।
धनतेरस
धनतेरस के अवसर पर भी कई घरों में माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है और पूजा के बाद आरती की जाती है।
कोजागरी पूर्णिमा
कोजागरी पूर्णिमा पर भी माता लक्ष्मी की आराधना करने की परंपरा कई क्षेत्रों में देखने को मिलती है।
इनके अलावा भक्त अपनी श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार नियमित रूप से भी माता लक्ष्मी की आरती कर सकते हैं।
लक्ष्मी माता की आरती पढ़ने का सही तरीका
आरती पढ़ते समय शब्दों का उच्चारण यथासंभव स्पष्ट रखें और आरती के भाव को समझकर श्रद्धा के साथ पाठ करें। यदि आरती परिवार के साथ की जा रही हो तो सभी लोग मिलकर आरती गा सकते हैं।
आरती को केवल जल्दी पूरा करने के बजाय उसके प्रत्येक पद में व्यक्त माता लक्ष्मी की स्तुति और भाव को समझने का प्रयास करना अधिक अर्थपूर्ण हो सकता है।
लक्ष्मी माता की आरती – FAQ
लक्ष्मी माता की आरती का संक्षिप्त परिचय
आरती का नाम: श्री लक्ष्मी जी की आरती
प्रमुख पंक्ति: ॐ जय लक्ष्मी माता
आराध्य देवी: माता लक्ष्मी
पूजा से संबंधित अवसर: शुक्रवार, दीपावली, धनतेरस, कोजागरी पूर्णिमा आदि
मुख्य भाव: माता लक्ष्मी की स्तुति, शुभता, सुख-संपन्नता और सद्गुणों का स्मरण
संबंधित भक्ति सामग्री
माता लक्ष्मी की आरती के साथ आप BhaktiHub पर अन्य संबंधित भक्ति सामग्री भी पढ़ सकते हैं:
- लक्ष्मी माता के मंत्र
- लक्ष्मी चालीसा
- लक्ष्मी अष्टकम
- श्री सूक्त
- विष्णु सहस्रनाम
- भगवान विष्णु की आरती
- गणेश जी की आरती
- माता दुर्गा की आरती
- माता सरस्वती की आरती
भक्ति पाठ करते समय अपनी श्रद्धा, पारिवारिक परंपरा और सुविधा के अनुसार पाठ का चयन करें।
अंतिम प्रार्थना
माता लक्ष्मी के चरणों में श्रद्धापूर्वक प्रार्थना है कि हमारे जीवन और परिवार में सद्बुद्धि, शांति, शुभता और सद्गुणों का वास हो। माता लक्ष्मी की आराधना हमें अपने जीवन में ईमानदारी, संतोष, सेवा और सदाचार के महत्व को समझने की प्रेरणा दे।
॥ ॐ जय लक्ष्मी माता ॥
॥ श्री महालक्ष्मी माता की जय ॥
