॥ श्रीगोविन्दाष्टकम् ॥
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श्री गोविन्दाष्टकम् अद्वैत वेदान्त के महान आचार्य आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक अत्यंत मधुर और गूढ़ स्तोत्र है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण (गोविन्द) के बाल, लीलामय और परमब्रह्म स्वरूप का अद्भुत वर्णन किया गया है। यह स्तोत्र कृष्ण को केवल गोकुल के नन्दलाल ही नहीं, बल्कि सत्य, ज्ञान और अनन्त परमानन्द स्वरूप परमेश्वर के रूप में प्रस्तुत करता है।
इस अष्टक में श्रीकृष्ण की बाल-लीलाएँ, कालिय नाग पर नृत्य, गोपियों के साथ क्रीड़ा तथा उनके ब्रह्मस्वरूप – सभी का सुंदर समन्वय मिलता है। भक्ति और ज्ञान का यह अनुपम संगम भक्त के हृदय को शुद्ध कर परम आनन्द की अनुभूति कराता है।
॥ श्रीगोविन्दाष्टकम् ॥
सत्यं ज्ञानमनन्तं नित्यमनाकाशं परमाकाशं
गोष्ठप्राङ्गणरिङ्गणलोलमनायासं परमायासम्।
मायाकल्पितनानाकारमनाकारं भुवनाकारं
क्ष्मामा नाथमनाथं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम्॥१॥
मृत्स्नामत्सीहेति यशोदाताडनशैशवसंत्रासं
व्यादितवक्त्रालोकितलोकालोकचतुर्दशलोकालिम्।
लोकत्रयपुरमूलस्तम्भं लोकालोकमनालोकं
लोकेशं परमेशं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम्॥२॥
त्रैविष्टपरिपुवीरघ्नं क्षितिभारघ्नं भवरोगघ्नं
कैवल्यं नवनीताहारमनाहारं भुवनाहारम्।
वैमल्यस्फुटचेतोवृत्तिविशेषाभासमनाभासं
शैवं केवलशान्तं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम्॥३॥
गोपालं भुलीलाविग्रहगोपालं कुलगोपालं
गोपीखेलनगोवर्धनधृतिलीलालालितगोपालम्।
गोभिर्निगदितगोविन्दस्फुटनामानं बहुनामानं
गोपीगोचरदूरं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम्॥४॥
गोपीमण्डलगोष्ठीभेदं भेदावस्थमभेदाभं
शश्वद्गोखुरनिर्धूतोद्धतधूलीधूसरसौभाग्यम्।
श्रद्धाभक्तिगृहीतानन्दमचिन्त्यं चिन्तितसद्भावं
चिन्तामणिमहिमानं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम्॥५॥
स्नानव्याकुलयोषिद्वस्त्रमुपादायागमुपारूढं
व्यादित्सन्तीरथ दिग्वस्त्रा ह्युपदातुमुपाकर्षन्तम्।
निर्धूतद्वयशोकविमोहं बुद्धं बुद्धेरन्तःस्थं
सत्तामात्रशरीरं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम्॥६॥
कान्तं कारणकारणमादिमनादिं कालमनाभासं
कालिन्दीगतकालियशिरसि मुहुर्नृत्यन्तं नृत्यन्तम्।
कालं कालकलातीतं कलिताशेषं कलिदोषघ्नं
कालत्रयगतिहेतुं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम्॥७॥
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वृन्दावनभुवि वृन्दारकगणवृन्दाराध्यं वन्देऽहं
कुन्दाभामलमन्दस्मेरसुधानन्दं सुहृदानन्दम्।
वन्द्याशेषमहामुनिमानसवन्द्यानन्दपदद्वन्द्वं
वन्द्याशेषगुणाब्धिं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम्॥८॥
गोविन्दाष्टकमेतदधीते गोविन्दार्पितचेता यो
गोविन्दाच्युत माधवविष्णो गोकुलनायक कृष्णेति।
गोविन्दाङ्घ्रिसरोजध्यानसुधाजलधौतसमस्ताघो
गोविन्दं परमानन्दामृतमन्तःस्थं स समभ्येति॥९॥
॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीगोविन्दाष्टकं सम्पूर्णम् ॥
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सरल अर्थ (Summary Meaning)
॥ श्लोकानुसार सरल अर्थ (हिंदी में) ॥
श्लोक (१) – अर्थ
भगवान गोविन्द सत्य, ज्ञान और अनंत हैं।
वे नित्य हैं, आकाश से भी परे परम आकाश स्वरूप हैं।
वे गोकुल के आँगन में खेलते हैं, फिर भी परम ब्रह्म हैं।
वे साकार भी हैं और निराकार भी।
ऐसे परमानन्दस्वरूप गोविन्द को मैं प्रणाम करता हूँ।
श्लोक (२) – अर्थ
बालक कृष्ण ने मिट्टी खा ली है—यह सुनकर यशोदा माता उन्हें डराती हैं।
जब वे मुख खोलते हैं, तब उसमें चौदहों लोक दिखाई देते हैं।
वे तीनों लोकों के आधार स्तंभ हैं।
ऐसे लोकों के स्वामी गोविन्द को मैं प्रणाम करता हूँ।
श्लोक (३) – अर्थ
वे देवताओं के शत्रुओं का नाश करने वाले हैं,
पृथ्वी के भार को हरने वाले हैं और संसार के रोग को मिटाने वाले हैं।
वे मक्खन खाने वाले बालक भी हैं और कैवल्य (मोक्ष) देने वाले भी।
ऐसे शुद्ध, शांत गोविन्द को मैं प्रणाम करता हूँ।
श्लोक (४) – अर्थ
वे गोपाल हैं, गोप कुल के रक्षक हैं।
गोवर्धन पर्वत उठाने वाली लीला से युक्त हैं।
उनके अनेक नाम हैं, फिर भी “गोविन्द” नाम सबसे मधुर है।
ऐसे परमानन्द गोविन्द को मैं प्रणाम करता हूँ।
श्लोक (५) – अर्थ
वे गोपियों की मंडली में रहते हैं,
भेद में अभेद और अभेद में भेद रूप हैं।
गो-खुरों से उठी धूल से जिनका सौंदर्य और बढ़ जाता है।
श्रद्धा और भक्ति से ही जिनका आनंद मिलता है—
ऐसे गोविन्द को मैं प्रणाम करता हूँ।
श्लोक (६) – अर्थ
चीरहरण लीला में गोपियों के वस्त्र लेकर
उन्हें अहंकार और भय से मुक्त करते हैं।
वे बुद्धि से परे हैं, पर बुद्धि के भीतर स्थित हैं।
ऐसे शुद्ध चेतना स्वरूप गोविन्द को मैं प्रणाम करता हूँ।
श्लोक (७) – अर्थ
वे कारणों के भी कारण हैं।
कालिय नाग के फन पर नृत्य करने वाले हैं।
वे काल से भी परे हैं और कलियुग के दोषों का नाश करते हैं।
ऐसे कालातीत गोविन्द को मैं प्रणाम करता हूँ।
श्लोक (८) – अर्थ
वृन्दावन में देवताओं द्वारा पूज्य हैं।
उनकी मंद मुस्कान अमृत के समान है।
महामुनियों द्वारा जिनके चरण वंदनीय हैं।
ऐसे अनंत गुणों के सागर गोविन्द को मैं प्रणाम करता हूँ।
श्लोक (९) – फलश्रुति
जो व्यक्ति श्रद्धा से इस गोविन्दाष्टकम् का पाठ करता है,
जो गोविन्द, अच्युत, माधव, विष्णु, कृष्ण का स्मरण करता है—
उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं
और वह अंतःकरण में स्थित परमानन्दस्वरूप गोविन्द को प्राप्त करता है।
