॥ अच्युताष्टकम् ॥
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श्री अच्युताष्टकम् भगवान श्रीकृष्ण / श्रीविष्णु की स्तुति में रचित एक अत्यंत मधुर एवं भक्तिपूर्ण संस्कृत स्तोत्र है। इस स्तोत्र की रचना महान वेदान्ताचार्य आदि शंकराचार्य जी ने की । इसमें भगवान के अच्युत, केशव, माधव, गोविन्द, रामचन्द्र, द्वारकानाथ आदि अनेक दिव्य नामों के द्वारा उनकी महिमा, सौंदर्य, करुणा तथा भक्तवत्सल स्वरूप का वर्णन किया गया है। अष्टक के प्रत्येक श्लोक में भगवान की लीलाओं, राक्षस-वध, भक्तों की रक्षा तथा उनके बाल और माधुर्य रूप का मनोहारी चित्रण मिलता है। यह स्तोत्र भक्ति, प्रेम और पूर्ण शरणागति का प्रतीक माना जाता है। कहा जाता है कि जो भक्त श्रद्धा और प्रेमपूर्वक इसका नियमित पाठ करता है, उस पर भगवान हरि शीघ्र प्रसन्न होते हैं और उसकी मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं।
॥ अच्युताष्टकम् ॥
अच्युतं केशवं रामनारायणंकृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम्।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभंजानकीनायकं रामचन्द्रं भजे॥१॥
अच्युतं केशवं सत्यभामाधवंमाधवं श्रीधरं राधिकाराधितम्।
इन्दिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरंदेवकीनन्दनं नन्दजं सन्दधे॥२॥
विष्णवे जिष्णवे शङ्खिने चक्रिणेरूक्मिणीरागिणे जानकीजानये।
वल्लवीवल्लभायार्चितायात्मनेकंसविध्वंसिने वंशिने ते नमः॥३॥
कृष्ण गोविन्दहे राम नारायणश्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे।
अच्युतानन्त हे माधवाधोक्षजद्वारकानायक द्रौपदीरक्षक॥४॥
राक्षसक्षोभितः सीतया शोभितोदण्डकारण्यभूपुण्यताकारणः।
लक्ष्मणेनान्वितो वानरैः सेवितोऽगस्त्यसम्पूजितो राघवः पातु माम्॥५॥
धेनुकारिष्टकानिष्टकृदद्वेषिहाकेशिहा कंसह्रद्वंशिकावादकः।
पूतनाकोपकः सूरजाखेलनोबालगोपालकः पातु मां सर्वदा॥६॥
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विद्युदुद्योतवत्प्रस्फुरद्वाससंप्रावृडम्भोदवत्प्रोल्लसद्विग्रहम्।
वन्यया मालया शोभितोरःस्थलंलोहिताङ्घ्रिद्वयं वारिजाक्षं भजे॥७॥
कुञ्चितैः कुन्तलैर्भ्राजमानाननंरत्नमौलिं लसत्कुण्डलं गण्डयोः।
हारकेयूरकं कङ्कणप्रोज्ज्वलंकिङ्किणीमञ्जुलं श्यामलं तं भजे॥८॥
अच्युतस्याष्टकं यः पठेदिष्टदंप्रेमतः प्रत्यहं पूरुषः सस्पृहम्।
वृत्ततः सुन्दरं कर्तृविश्वम्भरस्तस्यवश्यो हरिर्जायते सत्वरम्॥९॥
॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतमच्युताष्टकं सम्पूर्णम् ॥
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सरल अर्थ (Summary Meaning)
यह अष्टक भगवान विष्णु / श्रीकृष्ण के विभिन्न नामों और लीलाओं की मधुर स्तुति है। इसमें भगवान को अच्युत (अविनाशी), केशव, माधव, गोपिकावल्लभ, रामचन्द्र, द्वारकानाथ आदि रूपों में नमन किया गया है।
स्तुति में उनके सौंदर्य, करुणा, राक्षसों के संहार, भक्तों की रक्षा तथा बाल लीलाओं का वर्णन है।
इस स्तोत्र का भाव यह है कि जो भक्त प्रेमपूर्वक भगवान अच्युत का स्मरण करता है, उसकी सभी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं और भगवान स्वयं उसके वश में हो जाते हैं। यह स्तोत्र भक्ति, प्रेम और शरणागति का सुंदर उदाहरण है।
