॥ श्री गोपाल की आरती ॥
श्री गोपाल की यह आरती भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराधा जी के संयुक्त स्वरूप “जुगल किशोर” की स्तुति में गाई जाती है। इसमें ब्रज के नन्दलाल, गिरिधर गोविंद और राधारानी के अनुपम सौंदर्य, लीला और माधुर्य का वर्णन किया गया है। यह आरती विशेष रूप से वैष्णव परंपरा, ब्रजभूमि तथा कृष्ण भक्ति में अत्यंत प्रिय मानी जाती है। संध्या आरती, जन्माष्टमी, राधाष्टमी और प्रतिदिन संध्या पूजन में इसका पाठ किया जाता है।
॥ श्री गोपाल की आरती ॥
(आरती जुगल किशोर की कीजै)
आरती जुगल किशोर की कीजै,
राधे धन न्यौछावर कीजै॥
रवि शशि कोटि बदन की शोभा,
ताहि निरखि मेरा मन लोभा॥
गौर श्याम मुख निरखत रीझै,
प्रभु को स्वरूप नयन भर पीजै॥
कंचन थार कपूर की बाती,
हरि आये निर्मल भई छाती॥
फूलन की सेज फूलन की माला,
रतन सिंहासन बैठे नन्दलाला॥
मोर मुकुट कर मुरली सोहै,
नटवर वेष देखि मन मोहै॥
आधा नील पीत पट साड़ी,
कुञ्ज बिहारी गिरिवरधारी॥
श्री पुरुषोत्तम गिरिवरधारी,
आरती करें सकल ब्रजनारी॥
नन्दलाला वृषभानु किशोरी,
परमानन्द स्वामी अविचल जोरी॥
आरती जुगल किशोर की कीजै,
राधे धन न्यौछावर कीजै॥
आरती माहात्म्य: यह आरती राधा-कृष्ण के युगल स्वरूप की उपासना का माध्यम है।
- मन में प्रेम-भक्ति जागृत करती है।
- वैवाहिक जीवन में मधुरता और सौहार्द बढ़ाती है।
- मानसिक अशांति दूर कर आनंद और संतोष देती है।
- भक्ति मार्ग पर स्थिरता प्रदान करती है।
- विशेष रूप से जन्माष्टमी, राधाष्टमी, पूर्णिमा, एकादशी और दैनिक संध्या आरती में इसका गान शुभ माना जाता है।
सरल अर्थ (Summary Meaning): इस आरती में भक्त भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी की सुंदर जोड़ी की आरती करता है और अपना सर्वस्व उन्हें अर्पित करता है। उनके मुख की शोभा सूर्य-चंद्र से भी अधिक तेजस्वी बताई गई है। मोर मुकुट, मुरली, नटवर वेश और फूलों से सजे सिंहासन पर बैठे नन्दलाल का मनमोहक रूप वर्णित है। अंत में भक्त प्रार्थना करता है कि जुगल किशोर की कृपा सदा बनी रहे और जीवन आनंदमय हो।
