॥ श्री सिद्धिलक्ष्मी स्तोत्रम् ॥

श्री सिद्धिलक्ष्मी स्तोत्र – दरिद्रता का नाश, सुख-समृद्धि की प्राप्ति और जीवन में सिद्धि का आगमन।देवीपुराण, लक्ष्मी तंत्र तथा शक्तोपासना परंपरा में उल्लेख मिलता है कि लक्ष्मी के सिद्धि स्वरूप की आराधना करने से “स्थिर लक्ष्मी” की प्राप्ति होती है, अर्थात ऐसा धन और वैभव जो टिकाऊ और कल्याणकारी हो।शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि जो साधक श्रद्धा, शुद्धता और नियमपूर्वक स्तोत्र का पाठ करता है, उसके जीवन में दरिद्रता, विघ्न और नकारात्मक शक्तियाँ टिक नहीं पातीं। यह स्तोत्र साधना, मंत्र-जप और यंत्र-पूजन के साथ किया जाए तो विशेष फलदायी माना गया है।
॥ श्रीसिद्धिलक्ष्मीस्तोत्रम् ॥
॥ विनियोगः ॥
श्री गणेशाय नमः।
ॐ अस्य श्रीसिद्धिलक्ष्मीस्तोत्रस्य हिरण्यगर्भ ऋषिः,
अनुष्टुप् छन्दः, सिद्धिलक्ष्मीर्देवता, मम समस्त
दुःखक्लेशपीडादारिद्र्यविनाशार्थं
सर्वलक्ष्मीप्रसन्नकरणार्थं
महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताप्रीत्यर्थं च
सिद्धिलक्ष्मीस्तोत्रजपे विनियोगः॥
॥ करन्यासः ॥
ॐ सिद्धिलक्ष्मी अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।
ॐ ह्रीं विष्णुहृदये तर्जनीभ्यां नमः।
ॐ क्लीं अमृतानन्दे मध्यमाभ्यां नमः।
ॐ श्रीं दैत्यमालिनी अनामिकाभ्यां नमः।
ॐ तं तेजःप्रकाशिनी कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ब्राह्मी वैष्णवी माहेश्वरी करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः॥
॥ हृदयादिन्यासः ॥
ॐ सिद्धिलक्ष्मी हृदयाय नमः।
ॐ ह्रीं वैष्णवी शिरसे स्वाहा।
ॐ क्लीं अमृतानन्दे शिखायै वौषट्।
ॐ श्रीं दैत्यमालिनी कवचाय हुम्।
ॐ तं तेजःप्रकाशिनी नेत्रद्वयाय वौषट्।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ब्राह्मीं वैष्णवीं फट्॥
॥ ध्यानम् ॥
ब्राह्मीं च वैष्णवीं भद्रां षड्भुजां च चतुर्मुखाम्।
त्रिनेत्रां च त्रिशूलां च पद्मचक्रगदाधराम्॥ १॥
पीताम्बरधरां देवीं नानालङ्कारभूषिताम्।
तेजःपुञ्जधरां श्रेष्ठां ध्यायेद्बालकुमारिकाम्॥ २॥
॥ अथ मूलपाठः ॥
ॐकारलक्ष्मीरूपेण विष्णोर्हृदयमव्ययम्।
विष्णुमानन्दमध्यस्थं ह्रींकारबीजरूपिणी॥ ३॥
ॐ क्लीं अमृतानन्दभद्रे सद्य आनन्ददायिनी।
ॐ श्रीं दैत्यभक्षरदां शक्तिमालिनी शत्रुमर्दिनी॥ ४॥
तेजःप्रकाशिनी देवी वरदा शुभकारिणी।
ब्राह्मी च वैष्णवी भद्रा कालिका रक्तशाम्भवी॥ ५॥
आकारब्रह्मरूपेण ॐकारं विष्णुमव्ययम्।
सिद्धिलक्ष्मि परालक्ष्मि लक्ष्यलक्ष्मि नमोऽस्तुते॥ ६॥
सूर्यकोटिप्रतीकाशं चन्द्रकोटिसमप्रभम्।
तन्मध्ये निकरे सूक्ष्मं ब्रह्मरूपव्यवस्थितम्॥ ७॥
ॐकारपरमानन्दं क्रियते सुखसम्पदा।
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके॥ ८॥
प्रथमे त्र्यम्बका गौरी द्वितीये वैष्णवी तथा।
तृतीये कमला प्रोक्ता चतुर्थे सुरसुन्दरी॥ ९॥
पञ्चमे विष्णुपत्नी च षष्ठे च वैष्णवी तथा।
सप्तमे च वरारोहा अष्टमे वरदायिनी॥ १०॥
नवमे खड्गत्रिशूला दशमे देवदेवता।
एकादशे सिद्धिलक्ष्मीर्द्वादशे ललितात्मिका॥ ११॥
एतत्स्तोत्रं पठन्तस्त्वां स्तुवन्ति भुवि मानवाः।
सर्वोपद्रवमुक्तास्ते नात्र कार्या विचारणा॥ १२॥
एकमासं द्विमासं वा त्रिमासं च चतुर्थकम्।
पञ्चमासं च षण्मासं त्रिकालं यः पठेन्नरः॥ १३॥
ब्राह्मणाः क्लेशतो दुःखदरिद्रा भयपीडिताः।
जन्मान्तरसहस्रेषु मुच्यन्ते सर्वक्लेशतः॥ १४॥
अलक्ष्मीर्लभते लक्ष्मीमपुत्रः पुत्रमुत्तमम्।
धन्यं यशस्यमायुष्यं वह्निचौरभयेषु च॥ १५॥
शाकिनीभूतवेतालसर्वव्याधिनिपातके।
राजद्वारे महाघोरे सङ्ग्रामे रिपुसङ्कटे॥ १६॥
सभास्थाने श्मशाने च कारागेहारिबन्धने।
अशेषभयसम्प्राप्तौ सिद्धिलक्ष्मीं जपेन्नरः॥ १७॥
ईश्वरेण कृतं स्तोत्रं प्राणिनां हितकारणम्।
स्तुवन्ति ब्राह्मणा नित्यं दारिद्र्यं न च वर्धते॥ १८॥
या श्रीः पद्मवने कदम्बशिखरे राजगृहे कुञ्जरे।
श्वेते चाश्वयुते वृषे च युगले यज्ञे च यूपस्थिते॥
शङ्खे देवकुले नरेन्द्रभवनी गङ्गातटे गोकुले।
सा श्रीस्तिष्ठतु सर्वदा मम गृहे भूयात्सदा निश्चला॥ १९॥
॥ इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे ईश्वरविष्णुसंवादे
दारिद्र्यनाशनं सिद्धिलक्ष्मीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
धनदालक्ष्मी स्तोत्रम् का माहात्म्य:
- शास्त्रों के अनुसार सिद्धिलक्ष्मी देवी लक्ष्मी का विशेष स्वरूप है जो भक्तों को सिद्धि, ऐश्वर्य और सौभाग्य प्रदान करती हैं। इस स्तोत्र के नियमित पाठ से:
- दरिद्रता का नाश होता है
- घर में धन और लक्ष्मी का स्थायी निवास होता है
- शत्रु, भय और बाधाएँ दूर होती हैं
- सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है
- इस स्तोत्र में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती — तीनों दिव्य शक्तियों का आह्वान किया गया है।
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सरल अर्थ (Summary Meaning):
यह स्तोत्र माता सिद्धिलक्ष्मी की स्तुति है। इसमें देवी से प्रार्थना की गई है कि वे दुख, दरिद्रता और कष्टों को दूर करें तथा जीवन में सुख, समृद्धि और सिद्धि प्रदान करें।
विनियोग का अर्थ: इस स्तोत्र का जप सभी दुखों, क्लेशों, दरिद्रता और पीड़ा को दूर करने के लिए किया जाता है। साथ ही महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की कृपा प्राप्त करने के उद्देश्य से इसका पाठ किया जाता है।
ध्यान श्लोक (१–२) का अर्थ
देवी ब्राह्मी, वैष्णवी और भद्रा स्वरूप वाली हैं।
वे चार मुख और छह भुजाओं वाली हैं।
उनके हाथों में त्रिशूल, कमल, चक्र और गदा है।
वे पीले वस्त्र धारण करती हैं और दिव्य आभूषणों से सुसज्जित हैं।
वे तेजस्वी और बालिका समान पवित्र रूप में ध्यान करने योग्य हैं।
अर्थ: हमें देवी के दिव्य, शक्तिशाली और उज्ज्वल स्वरूप का ध्यान करना चाहिए।
मूल श्लोक (३–८) का अर्थ
देवी ओंकार स्वरूप हैं और भगवान विष्णु के हृदय में निवास करती हैं।
वे ह्रीं, क्लीं और श्रीं बीज मंत्रों की शक्ति हैं।
वे शत्रुओं का नाश करने वाली और आनंद देने वाली हैं।
वे ब्राह्मी, वैष्णवी, काली और शुभ देने वाली शक्ति हैं।
वे सूर्य और चंद्रमा के समान तेजस्वी हैं।
वे सभी मंगलों में श्रेष्ठ और सभी कार्यों को सिद्ध करने वाली हैं।
अर्थ: देवी सिद्धिलक्ष्मी सभी शक्तियों का संगम हैं और हर प्रकार की सिद्धि प्रदान करती हैं।
(९–११) का अर्थ
देवी अनेक रूपों में प्रकट होती हैं — गौरी, वैष्णवी, कमला, सुरसुंदरी आदि।
वे खड्ग और त्रिशूल धारण करती हैं।
वे सिद्धिलक्ष्मी और ललितात्मिका स्वरूप में भक्तों की रक्षा करती हैं।
अर्थ: माता अनेक रूपों में भक्तों का कल्याण करती हैं।
(१२–१७) का अर्थ
जो व्यक्ति इस स्तोत्र का नियमित पाठ करता है, वह सभी संकटों से मुक्त हो जाता है।
एक, दो या तीन महीने तक नियमित जप करने से दुख और दरिद्रता दूर हो जाती है।
निर्धन को धन, निःसंतान को संतान, भयभीत को साहस मिलता है।
युद्ध, अदालत, शत्रु संकट, बीमारी या किसी भी भय की स्थिति में इसका जप लाभकारी है।
(१८–१९) का अर्थ
यह स्तोत्र भगवान ईश्वर द्वारा प्राणियों के कल्याण के लिए कहा गया है।
जो इसे श्रद्धा से पढ़ता है, उसके घर में दरिद्रता नहीं बढ़ती।
माता श्री हर स्थान पर विराजमान हैं — कमलवन, राजमहल, मंदिर, गंगा तट —
वे सदैव मेरे घर में स्थिर होकर निवास करें।
