॥ महादेव आरती ॥
शिव ध्यान मंत्र: श्री शिव शंकर जी की आरती से पहले पढ़ें
ॐ ध्यानं शिवं शान्तमद्वैतमखिलं शिवम्।
शिवोऽहं शिवोऽहं शिवोऽहं शिवोऽहम्॥
॥ आरती श्री शिव शंकर जी की ॥
हर हर हर महादेव!
१.
सत्य, सनातन, सुन्दर, शिव सबके स्वामी।
अविकारी अविनाशी, अज अन्तर्यामी॥
हर हर हर महादेव!
२.
आदि, अनन्त, अनामय, अकल, कलाधारी।
अमल, अरूप, अगोचर, अविचल, अघहारी॥
हर हर हर महादेव!
३.
ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर तुम त्रिमूर्तिधारी।
कर्ता, भर्ता, धर्ता, तुम ही संहारी॥
हर हर हर महादेव!
४.
रक्षक, भक्षक, प्रेरक, प्रिय औढरदानी।
साक्षी, परम अकर्ता, कर्ता अभिमानी॥
हर हर हर महादेव!
५.
मणिमय-भवन निवासी, अति भोगी रागी।
सदा श्मशान विहारी, योगी वैरागी॥
हर हर हर महादेव!
६.
छाल-कपाल, गरल-गल, मुण्डमाल व्याली।
चिता भस्मतन त्रिनयन, अयनमहाकाली॥
हर हर हर महादेव!
७.
प्रेत-पिशाच-सुसेवित, पीत जटाधारी।
विवसन विकट रूपधर, रुद्र प्रलयकारी॥
हर हर हर महादेव!
८.
शुभ्र-सौम्य, सुरसरिधर, शशिधर, सुखकारी।
अतिकमनीय, शान्तिकर, शिवमुनि मन-हारी॥
हर हर हर महादेव!
९.
निर्गुण, सगुण, निरञ्जन, जगमय नित्य प्रभो।
कालरूप केवल हर! कालातीत विभो॥
हर हर हर महादेव!
१०.
सत्, चित्, आनन्द, रसमय, करुणामय धाता।
प्रेम-सुधा-निधि प्रियतम, अखिल विश्व त्राता॥
हर हर हर महादेव!
११.
हम अतिदीन, दयामय! चरण-शरण दीजै।
सब विधि निर्मल मति कर, अपना कर लीजै॥
हर हर हर महादेव!
श्री शिव शंकर जी की आरती का महत्व
यह आरती भगवान शिव के निर्गुण–सगुण, संहारक–पालक, और योगी–वैरागी स्वरूपों का समग्र वर्णन करती है। इसका नियमित पाठ मन को शुद्ध करता है, अहंकार का क्षय करता है और साधक को वैराग्य, करुणा व सत्य के मार्ग पर प्रेरित करता है। शिव-आराधना में यह आरती भक्ति, ज्ञान और कर्म—तीनों का सुंदर संगम है
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सरल अर्थ (Summary Meaning)
यह आरती बताती है कि शिव सत्य और सनातन हैं—न जन्म, न विनाश। वे त्रिमूर्ति रूप में सृष्टि के कर्ता, पालक और संहारक हैं। वे योगी होकर भी करुणामय हैं, श्मशानवासी होकर भी कल्याणकारी हैं। उनके रुद्र रूप में प्रलय है तो सौम्य रूप में शांति। अंत में भक्त दया, शरण और निर्मल बुद्धि की प्रार्थना करता है
लाभ (Benefits): नियमित रूप से आरती श्री शिव शंकर जी की पाठ करने से:
- मानसिक शांति और एकाग्रता में वृद्धि
- नकारात्मकता व भय का नाश
- कर्मों की शुद्धि और वैराग्य की प्राप्ति
- संकटों से रक्षा और आत्मबल में वृद्धि
- ध्यान व साधना में स्थिरता
- भक्ति भाव और करुणा का विकास
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