॥ श्री भवान्यष्टकम् ॥

“भवान्यष्टकम्” आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माँ भगवती भुवनेश्वरी/भवानी की अत्यंत करुणामयी स्तुति है। इस स्तोत्र में भक्त पूर्ण समर्पण भाव से कहता है कि संसार में कोई भी मेरा अंतिम सहारा नहीं — केवल आप ही मेरी शरण और गति हैं, हे माँ भवानी। यह स्तोत्र वैराग्य, आत्मसमर्पण और मातृ-कृपा का दिव्य संदेश देता है।
॥ श्री भवान्यष्टकम् ॥
न तातो न माता न बन्धुर्न दातान पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता।
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैवगतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥1॥
भवाब्धावपारे महादुःखभीरुःपपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः।
कुसंसारपाशप्रबद्धः सदाहंगतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥2॥
न जानामि दानं न च ध्यानयोगंन जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम्।
न जानामि पूजां न च न्यासयोगम्गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥3॥
न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थंन जानामि मुक्ति लयं वा कदाचित्।
न जानामि भक्ति व्रतं वापिमातर्गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥4॥
कुकर्मी कुसङ्गी कुबुद्धिः कुदासःकुलाचारहीनः कदाचारलीनः।
कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्धः सदाहम्गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥5॥
प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशंदिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित्।
न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्येगतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥6॥
विवादे विषादे प्रमादे प्रवासेजले चानले पर्वते शत्रुमध्ये।
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहिगतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥7॥
अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तोमहाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः।
विपत्तौ प्रविष्टः प्रणष्टः सदाहंगतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥8॥
॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं भवान्यष्टकं सम्पूर्णम् ॥
श्री दुर्गाष्टकम् का महत्व:
- यह स्तोत्र नवरात्रि में विशेष रूप से फलदायी माना जाता है।
- मानसिक शांति और आत्मबल प्रदान करता है।
- भय, शत्रु बाधा और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है।
- आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होता है।
- सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करता है।
शास्त्रों के अनुसार, जो व्यक्ति भक्ति भाव से श्री दुर्गाष्टकम् का पाठ करता है, वह अंततः माँ दुर्गा के लोक को प्राप्त करता है।
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सरल अर्थ: हर श्लोक के अंत में भाव है:
“हे माँ भवानी! आप ही मेरी एकमात्र गति और शरण हैं।”
१. न पिता, न माता, न बंधु—मेरी सच्ची शरण केवल आप हैं।
२. संसार रूपी समुद्र में दुखी और आसक्त मैं, आपके सिवा किसी को नहीं जानता।
३. मुझे दान, ध्यान, तंत्र-मंत्र का ज्ञान नहीं—आप ही मेरी गति हैं।
४. न पुण्य, न तीर्थ, न मुक्ति का बोध—हे माता, आप ही आश्रय हैं।
५. मैं कुसंग/कुकर्मों से ग्रस्त हूँ—फिर भी आपकी शरण चाहता हूँ।
६. ब्रह्मा-विष्णु-महेश को भी न जानूँ—हे शरण्ये, आप ही मेरी रक्षा करें।
७. विवाद, विषाद, संकट, यात्रा, अग्नि-जल-शत्रु में—सदा मेरी रक्षा करें।
८. अनाथ, दरिद्र, रोगी, विपत्ति में पड़ा—आप ही मेरी अंतिम आशा हैं।
