॥ श्री दीनबन्ध्वष्टकम् ॥

“श्री दीनबन्ध्वष्टकम्” भगवान श्रीविष्णु के करुणामय स्वरूप की स्तुति है। इसमें प्रभु को “दीनबन्धु” — अर्थात दीन-दुखियों के सच्चे मित्र — के रूप में पुकारा गया है। यह स्तोत्र भक्त की विनम्र प्रार्थना है कि वे हर परिस्थिति में प्रभु के दर्शन और कृपा के अधिकारी बनें। अंत में फलश्रुति में कहा गया है कि श्रद्धा से नित्य पाठ करने पर श्रीविष्णु प्रसन्न होते हैं।
॥ श्री दीनबन्ध्वष्टकम् ॥
यस्मादिदं जगदुदेति चतुर्मुखाद्यंयस्मिन्नवस्थितमशेषमशेषमूले।
यत्रोपयाति विलयं च समस्तमन्तेदृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः॥1॥
चक्रं सहस्रकरचारु करारविन्देगुर्वी गदा दरवरश्च विभाति यस्य।
पक्षीन्द्रपृष्ठपरिरोपितपादपद्मो।दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः॥2॥
येनोद्धृता वसुमती सलिले निमग्ना नग्नाच पाण्डववधूः स्थगिता दुकूलैः।
संमोचितो जलचरस्य मुखाद्गजेन्द्रो।दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः॥3॥
यस्यार्द्रदृष्टिवशतस्तु सुराः समृद्धिंकोपेक्षणेन दनुजा विलयं व्रजन्ति।
भीताश्चरन्ति च यतोऽर्कयमानिलाद्या।दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः॥4॥
गायन्ति सामकुशला यमजं मखेषुध्यायन्ति धीरमतयो यतयो विविक्ते।
पश्यन्ति योगिपुरुषाः पुरुषं शरीरे।दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः॥5॥
आकाररूपगुणयोगविवर्जितोऽपि मददभक्तानुकम्पननिमित्तगृहीतमूर्तिः।
यः सर्वगोऽपि कृतशेषशरीरशय्यो।दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः॥6॥
यस्याङ्घ्रिपङ्कजमनिद्रमुनीन्द्रवृन्दैराराध्यते भवदवानलदाहशान्त्यै।
सर्वापराधमविचिन्त्य ममाखिलात्मा।दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः॥7॥
यन्नामकीर्तनपरः श्वपचोऽपि नूनंहित्वाखिलं कलिमलं भुवनं पुनाति।
दग्ध्वा ममाघमखिलं करुणेक्षणेन।दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः॥8॥
दीनबन्ध्वष्टकं पुण्यंब्रह्मानन्देन भाषितम्।
यः पठेत् प्रयतो नित्यंतस्य विष्णुः प्रसीदति॥9॥
॥ इति श्रीमत्परमहंसस्वामिब्रह्मानन्दविरचितं श्रीदीनबन्ध्वष्टकं सम्पूर्णम् ॥
श्री दीनबन्ध्वष्टकम् का माहात्म्य:
- यह स्तोत्र भक्ति, समर्पण और करुणा का अद्भुत संगम है।
- विपत्ति, भय, निराशा या मानसिक अशांति के समय इसका पाठ अत्यंत फलदायी माना जाता है।
- इसमें भगवान की उन लीलाओं का स्मरण है जिनसे वे भक्तों का उद्धार करते हैं (जैसे गजेन्द्रमोक्ष, द्रौपदी की रक्षा आदि)।
- नित्य जप से मन में श्रद्धा, शांति और विष्णु-कृपा का अनुभव होता है।
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सरल अर्थ: श्री अच्युताष्टकम्
श्लोक 1 का अर्थ-जिस परमात्मा से ब्रह्मा आदि देवताओं सहित यह संपूर्ण जगत उत्पन्न होता है,
जिसमें यह सारा संसार स्थित रहता है,
और अंत में जिसमें लीन हो जाता है —
वे दीन-दिनों के मित्र भगवान आज मेरे नेत्रों के सामने प्रकट हों।
श्लोक 2 का अर्थ-जिनके सुंदर कमल समान हाथों में चक्र और भारी गदा शोभा दे रही है,
जिनके चरण कमल गरुड़ (पक्षीराज) के पृष्ठ पर विराजमान हैं —
वे दीनबन्धु भगवान मुझे दर्शन दें।
श्लोक 3 का अर्थ-जिन्होंने जल में डूबी पृथ्वी का उद्धार किया,
द्रौपदी की लाज बचाई,
और गजेन्द्र को मगर के मुख से मुक्त किया —
वे करुणामय प्रभु मुझे दृष्टिगोचर हों।
श्लोक 4 का अर्थ-जिनकी कृपा दृष्टि से देवता समृद्ध होते हैं,
और जिनकी क्रोध दृष्टि से दानव नष्ट हो जाते हैं,
जिनसे सूर्य, अग्नि और वायु भी भयभीत होकर कार्य करते हैं —
वे दीनबन्धु मुझे दर्शन दें।
श्लोक 5 का अर्थ-जिन्हें वेदज्ञ यज्ञों में गाते हैं,
जिन्हें धीर और तपस्वी लोग एकांत में ध्यान करते हैं,
जिन्हें योगी अपने हृदय में अनुभव करते हैं —
वे परम पुरुष मुझे दिखाई दें।
श्लोक 6 का अर्थ-जो निराकार और निर्गुण होते हुए भी
अपने भक्तों पर कृपा करने के लिए साकार रूप धारण करते हैं,
जो सर्वव्यापक हैं और शेषनाग पर शयन करते हैं —
वे दीनबन्धु मेरे सामने प्रकट हों।
श्लोक 7 का अर्थ-जिनके चरणकमलों की पूजा महान मुनि
संसार रूपी अग्नि की शांति के लिए करते हैं,
जो मेरे सभी अपराधों को क्षमा करने वाले हैं —
वे दीनबन्धु मुझे दर्शन दें।
श्लोक 8 का अर्थ-जिनका नाम जप करने से
अत्यंत पापी व्यक्ति भी अपने पापों से मुक्त होकर संसार को पवित्र कर देता है,
वे करुणामय प्रभु अपनी कृपा दृष्टि से मेरे समस्त पापों को नष्ट करें
और मुझे दर्शन दें।
फलश्रुति (श्लोक 9 का अर्थ)-यह पवित्र दीनबन्ध्वष्टकम् परमहंस स्वामी ब्रह्मानन्द द्वारा रचित है।
जो व्यक्ति इसे श्रद्धापूर्वक प्रतिदिन पढ़ता है, उस पर भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं।
