॥ श्रीनृसिंहाष्टकम् ॥

भगवान विष्णु के उग्र और करुणामय अवतार नृसिंह की स्तुति में रचित श्री नृसिंहाष्टकम् भक्तों को भय, संकट और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा प्रदान करता है। इस स्तोत्र का नियमित पाठ जीवन के क्लेश, बाधा और मानसिक अशांति को दूर कर आत्मबल और दिव्य संरक्षण प्रदान करता है। विशेष रूप से कठिन समय, भय या शत्रु बाधा में यह अत्यंत प्रभावकारी माना गया है।
॥ अथ श्रीनृसिंहाष्टकम् ॥
सुन्दर-जामातृ-मुनेः प्रपद्ये चरणाम्बुजम् ।
संसारार्णव-संमग्न-जन्तु-संतार-पोतकम् ॥
श्रीमदकलङ्क-परिपूर्ण! शशिकोटि-श्रीधर! मनोहर! सटापटल-कान्त! ।
पालय कृपालय! भवाम्बुधि-निमग्नं दैत्यवर-काल! नरसिंह! नरसिंह! ॥१॥
पाद-कमलावनत-पातकि-जनानां पातक-दवानल! पतत्रि-वर-केतो! ।
भावन! परायण! भवार्ति-हरया मां पाहि कृपयैव नरसिंह! नरसिंह! ॥२॥
तुङ्ग-नख-पङ्क्ति-दलितासुर-वरासृक्-पङ्क-नव-कुङ्कुम-विपङ्किल-महोरः ।
पण्डित-निधान! कमलालय! नमस्ते पङ्कज-निषण्ण! नरसिंह! नरसिंह! ॥३॥
मौलेषु विभूषणमिवामर-वराणां योगि-हृदयेषु च शिरस्सु निगमानाम् ।
राजद्-अरविन्द-रुचिरं पद-युगं ते देहि मम मूर्ध्नि नरसिंह! नरसिंह! ॥४॥
वारिज-विलोचन! मद-अन्तिम-दशायां क्लेश-विवशीकृत-समस्त-करणायाम् ।
एहि रमया सह शरण्य! विहगानां नाथम् अधिरुह्य नरसिंह! नरसिंह! ॥५॥
हाटक-किरीट-वर-हार-वनमाला-धार-रशना-मकर-कुण्डल-मणीन्द्रैः ।
भूषितमशेष-निलयं तव वपुर्मे चेतसि चकास्तु नरसिंह! नरसिंह! ॥६॥
इन्दु-रवि-पावक-विलोचन! रमायाः मन्दिर! महाभुज! लसद्-वर-रथाङ्ग! ।
सुन्दर! चिराय रमतां त्वयि मनो मे नन्दित-सुरेश! नरसिंह! नरसिंह! ॥७॥
माधव! मुकुन्द! मधुसूदन! मुरारे! वामन! नृसिंह! शरणं भव नतानाम् ।
कामद! घृणिन्! निखिल-कारण! नयेयं कालम् अमरेश! नरसिंह! नरसिंह! ॥८॥
अष्टकमिदं सकल-पातक-भय-घ्नं कामदं अशेष-दुरितामय-रिपु-घ्नम् ।
यः पठति सन्ततमशेष-निलयं ते गच्छति पदं स नरसिंह! नरसिंह! ॥९॥
॥ इति श्रीनृसिंहाष्टकं सम्पूर्णम् ॥
श्री नृसिंहाष्टकम् माहात्म्य:
- यह स्तोत्र पाप, भय और संकट का नाश करने वाला बताया गया है।
- दैत्य बाधा, शत्रु भय और मानसिक तनाव में अत्यंत लाभकारी।
- घर और परिवार की रक्षा हेतु प्रभावशाली।
- आध्यात्मिक उन्नति और विष्णु कृपा प्राप्ति का साधन।
- शास्त्रों में इसे सकल पातक भयघ्न और कामद (मनोकामना पूर्ण करने वाला) कहा गया है।
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सरल अर्थ:
मंगलाचरण (प्रारंभिक श्लोक) का अर्थ:- मैं उस महान मुनि (सुन्दर जामातृ मुनि) के चरण कमलों की शरण लेता हूँ, जिनका यह स्तोत्र है। वे संसार रूपी समुद्र में डूबे जीवों को पार कराने वाली नौका के समान हैं।
श्लोक १ का अर्थ:- हे निष्कलंक, पूर्ण और करोड़ों चंद्रमा के समान तेजस्वी प्रभु!
हे दैत्यों के संहारक नरसिंह! मैं संसार रूपी समुद्र में डूबा हुआ हूँ, कृपा करके मेरी रक्षा कीजिए।
श्लोक २ का अर्थ:- हे आपके चरणों में झुकने वाले पापियों के पापों को अग्नि की तरह जलाने वाले प्रभु!
हे गरुड़ध्वज! हे भक्तों के पालनकर्ता! कृपा करके मेरे संसारिक कष्टों को दूर कीजिए।
श्लोक ३ का अर्थ:- आपके ऊँचे और तीक्ष्ण नखों से दैत्यों का वध हुआ और उनका रक्त आपके वक्षस्थल पर कुमकुम की भाँति शोभायमान हुआ।
हे कमलनयन, विद्वानों के आश्रय! मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
श्लोक ४ का अर्थ:- आपके चरण देवताओं के मस्तक का आभूषण हैं और योगियों के हृदय में स्थित हैं।
हे प्रभु! आपके कमल समान सुंदर चरण मेरे सिर पर स्थापित हों।
श्लोक ५ का अर्थ:- हे कमलनयन! जब मृत्यु के समय मेरे इन्द्रिय शिथिल हो जाएँ, तब आप लक्ष्मीजी सहित गरुड़ पर आरूढ़ होकर मेरी रक्षा के लिए आएँ।
श्लोक ६ का अर्थ:- आप स्वर्ण मुकुट, हार, वनमाला, करधनी, मकराकृति कुण्डल आदि से भूषित हैं।
हे प्रभु! आपका यह दिव्य स्वरूप मेरे हृदय में सदा प्रकाशित रहे।
श्लोक ७ का अर्थ:- हे चंद्र, सूर्य और अग्नि समान नेत्रों वाले!
हे लक्ष्मीजी के निवास स्थान! मेरा मन सदा आप में रमण करे।
श्लोक ८ का अर्थ:- हे माधव, मुकुन्द, मधुसूदन, मुरारी, वामन और नृसिंह!
मैं आपकी शरण में आया हूँ। हे करुणामय प्रभु! मेरे जीवनकाल का मार्गदर्शन कीजिए।
श्लोक ९ (फलश्रुति) का अर्थ:- जो व्यक्ति इस अष्टक का निरंतर पाठ करता है, उसके सभी पाप और भय नष्ट हो जाते हैं।
वह इच्छित फल प्राप्त करता है और अंत में भगवान के दिव्य धाम को प्राप्त होता है।
यह अष्टक भगवान नृसिंह की करुणा, शौर्य और भक्त-रक्षा का स्तुतिगान है। इसका पाठ भय, संकट और पापों का नाश कर मन में साहस और भक्ति उत्पन्न करता है।
