॥ भगवान बदरीनाथ आरती ॥

भगवान बदरीनाथ आरती: हिमालय की पावन वादियों में स्थित श्री बदरीनाथ धाम भगवान विष्णु के प्रमुख चार धामों में से एक है। “जय जय श्री बदरीनाथ” आरती भक्तों द्वारा श्रद्धा, समर्पण और कृतज्ञता के भाव से गाई जाती है। यह आरती भगवान के निर्गुण-सगुण, करुणामय और योगी स्वरूप का गुणगान करती है तथा साधक के मन में शांति और भक्ति का संचार करती है।
जय जय श्री बदरीनाथ, जयति योग ध्यानी॥
जय जय श्री बदरीनाथ, जयति योग ध्यानी॥
जय जय श्री बदरीनाथ…॥
निर्गुण सगुण स्वरूप, मेघवर्ण अति अनूप।
सेवत चरण सुरभूप, ज्ञानी विज्ञानी॥
जय जय श्री बदरीनाथ…॥
झलकत है शीश छत्र, छवि अनूप अति विचित्र।
बरनत पावन चरित्र, सकुचत बरबानी॥
जय जय श्री बदरीनाथ…॥
तिलक भाल अति विशाल, गल में मणि मुक्त-माल।
प्रणतपाल अति दयाल, सेवक सुखदानी॥
जय जय श्री बदरीनाथ…॥
कानन कुण्डल ललाम, मूर्ति सुखमा की धाम।
सुमिरत हों सिद्धि काम, कहत गुण बखानी॥
जय जय श्री बदरीनाथ…॥
गावत गुण शम्भु शेष, इन्द्र चन्द्र अरु दिनेश।
विनवत श्यामा हमेश, जोरी जुगल पानी॥
जय जय श्री बदरीनाथ…॥
आरती का माहात्म्य: यह आरती विशेष रूप से:
- बदरीनाथ आरती का गान मन, वचन और कर्म की शुद्धि करता है।
- तीर्थ-स्मरण का पुण्य देता है और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।
- घर में नियमित गान से सकारात्मक ऊर्जा, सुख-समृद्धि और संरक्षण का अनुभव होता है।
- विशेष रूप से एकादशी, वैष्णव पर्व, तथा चार धाम यात्रा के समय इसका पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है।
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सरल अर्थ:
- “जय जय श्री बदरीनाथ जयति योग ध्यानी”
- — हे योगी स्वरूप प्रभु! आपकी जय हो, आप ध्यान में लीन रहने वाले हैं।
- “निर्गुण सगुण स्वरूप…”
- — आप निराकार भी हैं और साकार भी; आपका स्वरूप अद्वितीय है, देवता और ज्ञानी आपके चरणों की सेवा करते हैं।
- “तिलक भाल अति विशाल…”
- — आपके ललाट का तिलक, गले की मणि-मुक्ता मालाएँ आपकी दिव्य छवि को और शोभायमान करती हैं; आप शरणागतों के रक्षक हैं।
- “गावत गुण शम्भु, शेष…”
- — शिव, शेष, इन्द्र, चन्द्र और सूर्य भी आपके गुणों का गान करते हैं; हम भी हाथ जोड़कर आपकी वंदना करते हैं।
- (पूरी आरती प्रभु के दिव्य स्वरूप, करुणा और महिमा का स्तवन है।)
