॥ श्री लक्ष्मी चालीसा ॥

श्री लक्ष्मी माता चालीसा माता लक्ष्मी की स्तुति और प्रार्थना के रूप में पढ़ी जाने वाली एक भक्तिपूर्ण रचना है। इसमें भक्त माता लक्ष्मी से अपने हृदय में निवास करने, ज्ञान, बुद्धि और विद्या प्रदान करने तथा जीवन की कठिन परिस्थितियों में कृपा बनाए रखने की विनती करता है।
चालीसा के दोहे और चौपाइयों में माता लक्ष्मी को जगत जननी, सिंधु कुमारी, सुख की दाता और दुःख निवारिणी जैसे स्वरूपों में स्मरण किया गया है। इसमें भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी के संबंध, क्षीरसागर से उनके प्राकट्य तथा भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों में उनके साथ रहने का वर्णन भी मिलता है।
इस चालीसा का पाठ श्रद्धा और एकाग्रता के साथ माता लक्ष्मी के स्मरण के लिए किया जाता है। नीचे श्री लक्ष्मी माता चालीसा का पाठ, सरल भावार्थ, धार्मिक संदर्भ, पाठ की सामान्य विधि और इससे जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न दिए गए हैं।
॥ श्री लक्ष्मी माता चालीसा ॥
॥ दोहा ॥
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास।
मनोकामना सिद्ध करि, परुवहु मेरी आस॥
॥ सोरठा ॥
यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करुं।
सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदम्बिका।
॥ चौपाई ॥
सिन्धु सुता मैं सुमिरौ तोही।
ज्ञान, बुद्धि, विद्या दो मोही॥
तुम समान नहिं कोई उपकारी।
सब विधि पुरवहु आस हमारी॥
जय जय जगत जननि जगदम्बा।
सबकी तुम ही हो अवलम्बा॥
तुम ही हो सब घट घट वासी।
विनती यही हमारी खासी॥
जगजननी जय सिन्धु कुमारी।
दीनन की तुम हो हितकारी॥
विनवौं नित्य तुमहिं महारानी।
कृपा करौ जग जननि भवानी॥
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी।
सुधि लीजै अपराध बिसारी॥
कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी।
जगजननी विनती सुन मोरी॥
ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता।
संकट हरो हमारी माता॥
क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो।
चौदह रत्न सिन्धु में पायो॥
चौदह रत्न में तुम सुखरासी।
सेवा कियो प्रभु बनि दासी॥
जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा।
रुप बदल तहं सेवा कीन्हा॥
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा।
लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥
तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं।
सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥
अपनाया तोहि अन्तर्यामी।
विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥
तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी।
कहं लौ महिमा कहौं बखानी॥
मन क्रम वचन करै सेवकाई।
मन इच्छित वाञ्छित फल पाई॥
तजि छल कपट और चतुराई।
पूजहिं विविध भाँति मनलाई॥
और हाल मैं कहौं बुझाई।
जो यह पाठ करै मन लाई॥
ताको कोई कष्ट नोई।
मन इच्छित पावै फल सोई॥
त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि।
त्रिविध ताप भव बन्धन हारिणी॥
जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै।
ध्यान लगाकर सुनै सुनावै॥
ताकौ कोई न रोग सतावै।
पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥
पुत्रहीन अरु सम्पति हीना।
अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना॥
विप्र बोलाय कै पाठ करावै।
शंका दिल में कभी न लावै॥
पाठ करावै दिन चालीसा।
ता पर कृपा करैं गौरीसा॥
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै।
कमी नहीं काहू की आवै॥
बारह मास करै जो पूजा।
तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥
प्रतिदिन पाठ करै मन माही।
उन सम कोइ जग में कहुं नाहीं॥
बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई।
लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥
करि विश्वास करै व्रत नेमा।
होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥
जय जय जय लक्ष्मी भवानी।
सब में व्यापित हो गुण खानी॥
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं।
तुम सम कोउ दयालु कहुं नाहिं॥
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै।
संकट काटि भक्ति मोहि दीजै॥
भूल चूक करि क्षमा हमारी।
दर्शन दजै दशा निहारी॥
बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी।
तुमहि अछत दुःख सहते भारी॥
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में।
सब जानत हो अपने मन में॥
रुप चतुर्भुज करके धारण।
कष्ट मोर अब करहु निवारण॥
केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई।
ज्ञान बुद्धि मोहि नहिं अधिकाई॥
॥ दोहा ॥
त्राहि त्राहि दुःख हारिणी, हरो वेगि सब त्रास।
जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नाश॥
रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर।
मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर॥
श्री लक्ष्मी माता चालीसा का सरल भावार्थ
श्री लक्ष्मी माता चालीसा में भक्त माता लक्ष्मी से अपने जीवन में कृपा और सद्बुद्धि बनाए रखने की प्रार्थना करता है। शुरुआत में भक्त माता को हृदय में स्थान देने और अपनी प्रार्थना स्वीकार करने की विनती करता है।
चालीसा में माता लक्ष्मी को सिंधु कुमारी और जगत जननी के रूप में स्मरण किया गया है। भक्त उनसे ज्ञान, बुद्धि, विद्या और सुख प्रदान करने की प्रार्थना करता है तथा अपनी भूलों के लिए क्षमा मांगता है।
आगे चालीसा में क्षीरसागर के मंथन और चौदह रत्नों का प्रसंग आता है। माता लक्ष्मी को सुख और समृद्धि से जुड़े दिव्य स्वरूप के रूप में स्मरण किया गया है। भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों के संदर्भ में भी माता लक्ष्मी के साथ रहने का उल्लेख किया गया है।
चालीसा का एक महत्वपूर्ण भाव यह है कि भक्त छल-कपट छोड़कर श्रद्धा और विश्वास के साथ माता की उपासना करे। अंतिम भाग में भक्त माता से अपने कष्टों को दूर करने, भक्ति प्रदान करने और अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा करने की प्रार्थना करता है।
श्री लक्ष्मी माता चालीसा में माता लक्ष्मी के कौन-कौन से स्वरूप मिलते हैं?
इस चालीसा में माता लक्ष्मी का वर्णन केवल धन और ऐश्वर्य से जुड़े स्वरूप में नहीं, बल्कि कई भक्तिपूर्ण रूपों में किया गया है।
1. जगत जननी
चालीसा में माता को जगत जननी और जगदम्बा कहा गया है। भक्त उन्हें सभी के लिए सहारा और माता के रूप में स्मरण करता है।
2. सिंधु कुमारी
माता लक्ष्मी को सिंधु सुता और सिंधु कुमारी कहा गया है। यह उनके समुद्र से जुड़े प्राकट्य की ओर संकेत करता है।
3. ज्ञान और बुद्धि की दाता
चालीसा में भक्त माता लक्ष्मी से ज्ञान, बुद्धि और विद्या देने की प्रार्थना करता है। इससे स्पष्ट होता है कि इस स्तुति में लक्ष्मी का स्मरण केवल भौतिक समृद्धि तक सीमित नहीं है।
4. सुख की दाता
चालीसा में माता को सुख प्रदान करने वाली देवी के रूप में संबोधित किया गया है। भक्त अपने जीवन में सुख और मंगल की कामना के साथ उनकी स्तुति करता है।
5. दुःख निवारिणी
चालीसा के पदों में माता को दुःख निवारिणी कहकर जीवन के कष्टों में उनकी कृपा की प्रार्थना की गई है।
6. चतुर्भुज स्वरूप
चालीसा के अंतिम भाग में भक्त माता से चतुर्भुज रूप धारण करके अपने कष्टों का निवारण करने की प्रार्थना करता है। यह माता लक्ष्मी के पारंपरिक दिव्य स्वरूप का स्मरण है।
श्री लक्ष्मी माता चालीसा में वर्णित धार्मिक संदर्भ
क्षीरसागर और चौदह रत्न
चालीसा में क्षीरसागर के मंथन और उससे प्राप्त चौदह रत्नों का उल्लेख मिलता है। इसी प्रसंग के माध्यम से माता लक्ष्मी के प्राकट्य और उनके दिव्य स्वरूप का स्मरण किया गया है।
भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी
चालीसा में भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों का उल्लेख करते हुए माता लक्ष्मी के उनके साथ रहने की भक्तिपूर्ण भावना व्यक्त की गई है।
जनकपुर का प्रसंग
चालीसा की चौपाइयों में भगवान विष्णु के राम रूप में अवतार और जनकपुर में माता लक्ष्मी के प्राकट्य का वर्णन मिलता है। यह प्रसंग भक्तिपरंपरा में माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु के संबंध को दर्शाता है।
भक्ति और विश्वास
चालीसा में बार-बार श्रद्धा, विश्वास, पूजा और विनय का भाव दिखाई देता है। भक्त माता के सामने अपनी सीमाओं को स्वीकार करते हुए उनसे कृपा और भक्ति की प्रार्थना करता है।
श्री लक्ष्मी माता चालीसा का पाठ कैसे करें?
श्री लक्ष्मी माता चालीसा का पाठ करने के लिए किसी विशेष जटिल विधि की आवश्यकता नहीं मानी जाती। सामान्य रूप से इसे श्रद्धा और एकाग्रता के साथ पढ़ा जा सकता है।
सामान्य पूजा क्रम:
- पूजा स्थान को साफ करें।
- माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाएं।
- माता लक्ष्मी का ध्यान करें।
- अपनी श्रद्धा के अनुसार पुष्प या अन्य पूजा सामग्री अर्पित करें।
- श्री लक्ष्मी माता चालीसा का पाठ करें।
- अंत में माता लक्ष्मी से अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा और सद्बुद्धि की प्रार्थना करें।
- यदि चाहें तो अंत में आरती भी कर सकते हैं।
पूजा की विधि परिवार और परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
श्री लक्ष्मी माता चालीसा कब पढ़ें?
माता लक्ष्मी की उपासना के लिए शुक्रवार को विशेष रूप से शुभ माना जाता है। इसके अतिरिक्त दीपावली, धनतेरस तथा लक्ष्मी पूजा के अवसरों पर भी भक्त माता लक्ष्मी का स्मरण और पूजन करते हैं।
चालीसा का पाठ केवल किसी एक पर्व तक सीमित नहीं है। भक्त अपनी श्रद्धा और सुविधा के अनुसार नियमित रूप से भी इसका पाठ कर सकते हैं।
श्री लक्ष्मी माता चालीसा पढ़ने का भाव
चालीसा का मुख्य भाव माता लक्ष्मी के प्रति श्रद्धा, विनय, विश्वास और प्रार्थना है।
इसमें भक्त माता से केवल सुख-संपत्ति की ही नहीं, बल्कि ज्ञान, बुद्धि, विद्या, भक्ति और संकट के समय कृपा की भी प्रार्थना करता है।
इसलिए चालीसा पढ़ते समय केवल शब्दों का पाठ करने के बजाय उसके भाव को समझकर माता का स्मरण करना अधिक अर्थपूर्ण हो सकता है।
श्री लक्ष्मी माता चालीसा से जुड़े FAQ
श्री लक्ष्मी माता चालीसा का महत्व
श्री लक्ष्मी माता चालीसा में माता लक्ष्मी के प्रति भक्त की विनम्र प्रार्थना दिखाई देती है। इसमें ज्ञान, बुद्धि, विद्या, सुख, भक्ति और संकट के समय माता की कृपा की कामना की गई है।
चालीसा की विशेषता यह है कि इसमें माता लक्ष्मी के विभिन्न स्वरूपों के साथ भगवान विष्णु से जुड़े धार्मिक प्रसंगों का भी उल्लेख मिलता है। भक्त माता के सामने अपनी भूल-चूक स्वीकार करते हुए उनसे कृपा और भक्ति प्रदान करने की प्रार्थना करता है।
इस प्रकार श्री लक्ष्मी माता चालीसा का पाठ श्रद्धा, विश्वास और प्रार्थना के भाव से किया जा सकता है।
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