सरल अर्थ:

1–3 श्लोक का अर्थ

इन श्लोकों में भक्त माँ काली का वर्णन करता है।
हे माँ काली! आप कृशोदरी (पतली कमर वाली), महाचण्डी, खुले केशों वाली और बलि को प्रिय हैं।
आप कुलाचार को प्रसन्न करने वाली और भगवान शिव की प्रिय हैं, आपको नमस्कार है।
आपके भयानक दाँत और गहरे नेत्र हैं, आपकी गर्जना से संसार कांप उठता है।
आप भक्तों के मन में निवास करने वाली और सभी भय को नष्ट करने वाली देवी हैं।

4–6 श्लोक का अर्थ

हे देवी! आप सम्पूर्ण जगत की धारण करने वाली हैं।
आप त्रिदेवों की शक्ति हैं और भक्तों को वर देने वाली हैं।
आप महिषासुर का वध करने वाली और सभी विघ्नों को नष्ट करने वाली हैं।
आपके गले में मुंडों की माला है और आप भैरव की प्रिय हैं।

7–12 श्लोक का अर्थ

इन श्लोकों में माँ काली के उग्र और तांत्रिक रूप का वर्णन है।
आपका शरीर काजल के समान काला है और आप शव पर स्थित हैं।
आपके मुख से रक्त की धार बहती है, फिर भी आपका मुख कमल की तरह सुन्दर है।
आपके गले में मुंडमाला और शरीर पर हड्डियों के आभूषण हैं।
आप शिव और विष्णु द्वारा भी पूजित हैं।

13–14 श्लोक का अर्थ

आपके बाएँ हाथ में खड्ग और मुंड है और दाहिने हाथ से आप अभय और वरदान देती हैं।
हे चण्डनायिका! आप परम गति और जगत की माता हैं।
कृपा करके मेरी रक्षा करें।

15–18 श्लोक का अर्थ

यहाँ भक्त देवी से वरदान माँगता है।
हे भक्तवत्सला माँ! मेरी मूर्खता दूर करें और मुझे बुद्धि व प्रतिभा दें।
मुझे वाणी की शक्ति, तर्क और व्याकरण आदि का ज्ञान दें।
सभा में विजय, धन, दीर्घायु और रक्षा प्रदान करें।
राज्य, यश, पुत्र, पत्नी और धन दें और अंत समय में मोक्ष प्रदान करें।

19–23 श्लोक का अर्थ

इन श्लोकों में देवी के अनेक नाम बताए गए हैं।
माँ काली ही
मंगला
भैरवी
दुर्गा
उमा
ब्राह्मी
माहेश्वरी
वैष्णवी
वाराही
चण्डी
आदि अनेक रूपों में प्रकट होती हैं।
अर्थ यह है कि सभी शक्तियाँ एक ही आदिशक्ति काली के रूप हैं।

24–26 श्लोक का अर्थ

हे देवी! यदि इस स्तोत्र में कोई त्रुटि हो गई हो तो क्षमा करें।
मेरी, मेरे परिवार और धन की रक्षा करें।
जो व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ करता है उसे धन, अन्न, संतान और सुख प्राप्त होता है।

यह स्तोत्र माँ काली की शक्ति, उग्र रूप और करुणा का वर्णन करता है। इसमें भक्त उनसे रक्षा, ज्ञान, धन, विजय, संतान और अंत में मोक्ष की प्रार्थना करता है।

    दक्षिण कालिका स्तोत्र एक प्राचीन तांत्रिक स्तुति है, जिसका रचनाकार अज्ञात है। यह शाक्त परंपरा और काली उपासना से संबंधित है तथा इसे प्राचीन ऋषियों और तांत्रिक साधकों द्वारा प्रसारित किया गया है।

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