आरती श्री गणपति जी

सरल अर्थ (Summary Meaning)

इस आरती में भक्त भगवान गणेश की सेवा को अत्यंत मंगलकारी बताते हैं। कहा गया है कि उनकी सच्ची सेवा से जीवन के सभी विघ्न और बाधाएँ दूर हो जाती हैं। तीनों लोकों के देवता भी भगवान गणेश के द्वार पर खड़े होकर उनसे कृपा की प्रार्थना करते हैं।

रिद्धि और सिद्धि सदा भगवान गणेश के दोनों ओर विराजमान रहती हैं और आनंदपूर्वक उनकी सेवा करती हैं। भक्त धूप-दीप लेकर आरती करते हैं और जयकार करते हुए प्रभु की स्तुति करते हैं।

भगवान गणेश को गुड़ के मोदक अत्यंत प्रिय हैं और वे मूषक वाहन पर विराजमान हैं। उनके सौम्य और सुंदर रूप को देखकर सभी विघ्न और कष्ट दूर भाग जाते हैं।

भाद्रपद मास की शुक्ल चतुर्थी को माता दुर्गा के आनंद के साथ भगवान गणेश का जन्म हुआ। उस समय इन्द्र सहित सभी देवताओं ने बाजे बजाए और हर्ष से उनका गुणगान किया।

ब्रह्मा, विधाता, अप्सराएँ और वेद भी उनकी महिमा का गान करते हैं और उन्हें विघ्न विनाशक कहते हैं। एकदन्त, गजमुख, त्रिनेत्रधारी गणपति का रूप अत्यंत अनुपम है।

चन्द्रदेव के अभिमान के कारण उन्हें गणेश जी के श्राप का प्रसंग भी बताया गया है, जिससे यह संदेश मिलता है कि अहंकार का नाश होना चाहिए। गणेश जी चौदह लोकों में विचरण करते हैं और तीनों लोकों के स्वामी हैं।

जो भक्त प्रातः उठकर ध्यान-जप करता है और श्रद्धा से आरती गाता है, उसके सभी कार्य सफल होते हैं और उसे यश तथा सम्मान प्राप्त होता है।

अंत में कहा गया है कि जो व्यक्ति किसी भी कार्य से पहले भगवान गणेश की पूजा करता है, उसके सभी कार्य बिना बाधा के पूर्ण होते हैं और सभी भक्त हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करते हैं।

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