॥ आरती श्री गणपति जी की ॥
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गणपति की सेवा मंगल मेवा” श्री गणेश जी की एक अत्यंत प्रसिद्ध और भक्तिपूर्ण आरती है। इस आरती में भगवान गणेश की महिमा, उनके जन्म का वर्णन तथा उनके विघ्नहर्ता स्वरूप की सुंदर स्तुति की गई है। यह आरती विशेष रूप से गणेश चतुर्थी, बुधवार तथा किसी भी शुभ कार्य से पूर्व गाई जाती है। मान्यता है कि इस आरती के नियमित पाठ से सभी विघ्न दूर होते हैं और जीवन में सफलता, सुख-शांति एवं समृद्धि प्राप्त होती है।
॥ आरती श्री गणपति जी ॥
(गणपति की सेवा मंगल मेवा)
गणपति की सेवा मंगल मेवा, सेवा से सब विघ्न टरें।
तीन लोक के सकल देवता, द्वार खड़े नित अर्ज करें॥
गणपति की सेवा मंगल मेवा…
रिद्धि-सिद्धि दक्षिण वाम विराजें, अरु आनंद सों चमर करें।
धूप-दीप अरु लिए आरती, भक्त खड़े जयकार करें॥
गणपति की सेवा मंगल मेवा…
गुड़ के मोदक भोग लगत हैं, मूषक वाहन चढ़ा सरें।
सौम्य रूप को देख गणपति के, विघ्न भाग जाएँ दूर परें॥
गणपति की सेवा मंगल मेवा…
भादो मास अरु शुक्ल चतुर्थी, दिन दुपारा दूर परें।
लियो जन्म गणपति प्रभु जी, दुर्गा मन आनंद भरें॥
गणपति की सेवा मंगल मेवा…
अद्भुत बाजा बजा इन्द्र का, देव बंधु सब गान करें।
श्री शंकर के आनंद उपज्या, नाम सुन्यो सब विघ्न टरें॥
गणपति की सेवा मंगल मेवा…
आनि विधाता बैठे आसन, इन्द्र अप्सरा नृत्य करें।
देख वेद ब्रह्मा जी जाको, विघ्न विनाशक नाम धरें॥
गणपति की सेवा मंगल मेवा…
एकदन्त गजवदन विनायक, त्रिनयन रूप अनूप धरें।
पगथंभा सा उदर पुष्ट है, देव चन्द्रमा हास्य करें॥
गणपति की सेवा मंगल मेवा…
दे शराप श्री चन्द्रदेव को, कलाहीन तत्काल करें।
चौदह लोक में फिरें गणपति, तीन लोक में राज्य करें॥
गणपति की सेवा मंगल मेवा…
उठि प्रभात जप करें ध्यान, कोई ताके कारज सर्व सरें।
पूजा काल आरती गावैं, ताके शिर यश छत्र फिरें॥
गणपति की सेवा मंगल मेवा…
गणपति की पूजा पहले करने से, काम सभी निर्विघ्न सरें।
सभी भक्त गणपति जी के, हाथ जोड़कर स्तुति करें॥
गणपति की सेवा मंगल मेवा…
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सरल अर्थ (Summary Meaning)
इस आरती में भक्त भगवान गणेश की सेवा को अत्यंत मंगलकारी बताते हैं। कहा गया है कि उनकी सच्ची सेवा से जीवन के सभी विघ्न और बाधाएँ दूर हो जाती हैं। तीनों लोकों के देवता भी भगवान गणेश के द्वार पर खड़े होकर उनसे कृपा की प्रार्थना करते हैं।
रिद्धि और सिद्धि सदा भगवान गणेश के दोनों ओर विराजमान रहती हैं और आनंदपूर्वक उनकी सेवा करती हैं। भक्त धूप-दीप लेकर आरती करते हैं और जयकार करते हुए प्रभु की स्तुति करते हैं।
भगवान गणेश को गुड़ के मोदक अत्यंत प्रिय हैं और वे मूषक वाहन पर विराजमान हैं। उनके सौम्य और सुंदर रूप को देखकर सभी विघ्न और कष्ट दूर भाग जाते हैं।
भाद्रपद मास की शुक्ल चतुर्थी को माता दुर्गा के आनंद के साथ भगवान गणेश का जन्म हुआ। उस समय इन्द्र सहित सभी देवताओं ने बाजे बजाए और हर्ष से उनका गुणगान किया।
ब्रह्मा, विधाता, अप्सराएँ और वेद भी उनकी महिमा का गान करते हैं और उन्हें विघ्न विनाशक कहते हैं। एकदन्त, गजमुख, त्रिनेत्रधारी गणपति का रूप अत्यंत अनुपम है।
चन्द्रदेव के अभिमान के कारण उन्हें गणेश जी के श्राप का प्रसंग भी बताया गया है, जिससे यह संदेश मिलता है कि अहंकार का नाश होना चाहिए। गणेश जी चौदह लोकों में विचरण करते हैं और तीनों लोकों के स्वामी हैं।
जो भक्त प्रातः उठकर ध्यान-जप करता है और श्रद्धा से आरती गाता है, उसके सभी कार्य सफल होते हैं और उसे यश तथा सम्मान प्राप्त होता है।
अंत में कहा गया है कि जो व्यक्ति किसी भी कार्य से पहले भगवान गणेश की पूजा करता है, उसके सभी कार्य बिना बाधा के पूर्ण होते हैं और सभी भक्त हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करते हैं।
