॥ श्री सिद्धिविनायक अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्॥
“अगर आप जीवन में बार-बार रुकावटों का सामना कर रहे हैं,
तो यह स्तोत्र आपके लिए अत्यंत प्रभावी उपाय साबित हो सकता है।”
श्री सिद्धिविनायक अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र भगवान गणेश जी के 108 पवित्र नामों का दिव्य संग्रह है।
इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से जीवन के सभी विघ्न दूर होते हैं, बुद्धि और सफलता प्राप्त होती है।
इस लेख में आप जानेंगे:
स्तोत्र का सम्पूर्ण पाठ
प्रत्येक श्लोक का सरल हिंदी अर्थ
पाठ करने के लाभ
सही विधि और समय
॥ श्री सिद्धिविनायक अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥
विनायको विघ्नराजो गौरीपुत्रो गणेश्वरः।
स्कन्दाग्रजोऽव्ययो पूतो दक्षोऽध्यक्षो द्विजप्रियः॥ १ ॥
अग्निगर्भच्छिदिन्द्रश्रीप्रदो वाणीबलप्रदः।
सर्वसिद्धिप्रदः शर्वतनयः शर्वरीप्रियः॥ २ ॥
सर्वात्मकः सृष्टिकर्ता देवोऽनेकार्चितः शिवः।
शुद्धो बुद्धिप्रियः शान्तो ब्रह्मचारी गजाननः॥ ३ ॥
द्वैमात्रेयो मुनिस्तुत्यो भक्तविघ्नविनाशनः।
एकदन्तश्चतुर्बाहुश्चतुरः शक्तिसंयुतः॥ ४ ॥
लम्बोदरः शूर्पकर्णो हरिर्ब्रह्म विदुत्तमः।
कालो ग्रहपतिः कामी सोमसूर्याग्निलोचनः॥ ५ ॥
पाशाङ्कुशधरः चण्डो गुणातीतो निरञ्जनः।
अकल्मषः स्वयं सिद्धः सिद्धार्चितपदाम्बुजः॥ ६ ॥
बीजपूरफलासक्तो वरदः शाश्वतः कृतिः।
द्विजप्रियो वीतभयो गदी चक्री क्षुचापधृत्॥ ७ ॥
श्रीदोऽजोत्पलकरः श्रीपतिः स्तुतिहर्षितः।
कुलाद्रिभेत्ता जटिलः कलिकल्मषनाशनः॥ ८ ॥
चन्द्रचूडामणिः कान्तः पापहारी समाहितः।
आश्रितश्रीकरः सौम्यो भक्तवाञ्छितदायकः॥ ९ ॥
शान्तः कैवल्यसुखदः सच्चिदानन्दविग्रहः।
ज्ञानी दयायुतो दान्तो ब्रह्म द्वेषविवर्जितः॥ १० ॥
प्रमत्तदैत्यभयदः श्रीकण्ठो विबुधेश्वरः।
रमार्चितो विधिर्नागराजयज्ञोपवीतकः॥ ११ ॥
स्थूलकण्ठः स्वयं कर्ता सामघोषप्रियः परः।
स्थूलतुण्डोऽग्रणीर्धीरो वागीशः सिद्धिदायकः॥ १२ ॥
दूर्वाबिल्वप्रियोऽव्यक्तमूर्तिरद्भुतमूर्तिमान्।
शैलेन्द्रतनुजोत्सङ्गखेलनोत्सुकमानसः॥ १३ ॥
स्वलावण्यसुधासारोजितमन्मथविग्रहः।
समस्तजगदाधारो मायी मूषकवाहनः॥ १४ ॥
हृष्टस्तुष्टः प्रसन्नात्मा सर्वसिद्धिप्रदायकः।
अष्टोत्तरशतेनैवं नाम्नां विघ्नेश्वरं विभुम्॥ १५ ॥
तुष्टाव शङ्करः पुत्रं त्रिपुरं हन्तुमुद्यतः।
यः पूजयेदनेनैव भक्त्या सिद्धिविनायकम्॥ १६ ॥
दूर्वादलैर्बिल्वपत्रैः पुष्पैर्वा चन्दनाक्षतैः।
सर्वान्कामानवाप्नोति सर्वविघ्नैः प्रमुच्यते॥ १७ ॥
॥ इति श्री विघ्नेश्वर अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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श्री सिद्धिविनायक अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र – अर्थ
यह स्तोत्र बताता है कि भगवान गणेश बुद्धि, शक्ति, सिद्धि, शांति और सफलता के दाता हैं।
उनकी भक्ति से जीवन के सभी बाधाएँ दूर होकर सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।
श्लोक 1
विनायको विघ्नराजो…
भगवान गणेश ही विनायक (सर्वश्रेष्ठ), विघ्नों के राजा, माता पार्वती के पुत्र और गणों के ईश्वर हैं। वे स्कंद (कार्तिकेय) के बड़े भाई, अविनाशी, पवित्र, कुशल, श्रेष्ठ नेता और ब्राह्मणों के प्रिय हैं।
श्लोक 2
अग्निगर्भच्छिदिन्द्र…
वे अग्नि के समान तेजस्वी, इंद्र के समान ऐश्वर्य देने वाले, वाणी और बल प्रदान करने वाले हैं। वे सभी सिद्धियाँ देने वाले, भगवान शिव के पुत्र और रात्रि (शांति) के प्रिय हैं।
श्लोक 3
सर्वात्मकः सृष्टिकर्ता…
वे सम्पूर्ण जगत में व्याप्त, सृष्टि के रचयिता, अनेक देवताओं द्वारा पूजित, कल्याणकारी, शुद्ध, बुद्धि के प्रिय, शांत और ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले गजानन हैं।
श्लोक 4
द्वैमात्रेयो मुनिस्तुत्यो…
वे “ॐ” के स्वरूप, मुनियों द्वारा स्तुत, भक्तों के विघ्नों को नष्ट करने वाले हैं। वे एक दांत वाले, चार भुजाओं वाले, अत्यंत बुद्धिमान और शक्ति से युक्त हैं।
श्लोक 5
लम्बोदरः शूर्पकर्णो…
वे बड़े पेट वाले, बड़े कानों वाले, विष्णु और ब्रह्मा से भी श्रेष्ठ, समय के स्वामी, ग्रहों के अधिपति और जिनकी आँखें चंद्र, सूर्य और अग्नि के समान हैं।
श्लोक 6
पाशाङ्कुशधरः…
वे पाश और अंकुश धारण करने वाले, क्रोधी रूप में भी दुष्टों का नाश करने वाले, गुणों से परे, निर्मल, पापरहित, स्वयं सिद्ध और सिद्धों द्वारा पूजित हैं।
श्लोक 7
बीजपूरफलासक्तो…
वे फल प्रिय, वरदान देने वाले, शाश्वत, कर्मशील, ब्राह्मणों के प्रिय, निर्भय, गदा और चक्र धारण करने वाले हैं।
श्लोक 8
श्रीदोऽजोत्पलकरः…
वे लक्ष्मी प्रदान करने वाले, कमल धारण करने वाले, भगवान विष्णु के समान, स्तुति से प्रसन्न होने वाले और कलियुग के पापों का नाश करने वाले हैं।
श्लोक 9
चन्द्रचूडामणिः…
वे चंद्रमणि से सुशोभित, सुंदर, पापों का नाश करने वाले, शांत, भक्तों को सुख और इच्छित फल देने वाले हैं।
श्लोक 10
शान्तः कैवल्यसुखदः…
वे परम शांति देने वाले, मोक्ष प्रदान करने वाले, सच्चिदानंद स्वरूप, ज्ञानी, दयालु, इंद्रिय संयमी और किसी से द्वेष न रखने वाले हैं।
श्लोक 11
प्रमत्तदैत्यभयदः…
वे दैत्यों के लिए भय उत्पन्न करने वाले, शिव के प्रिय, देवताओं के ईश्वर, लक्ष्मी द्वारा पूजित और नाग (सर्प) को यज्ञोपवीत रूप में धारण करने वाले हैं।
श्लोक 12
स्थूलकण्ठः स्वयं कर्ता…
वे स्थूल कंठ वाले, स्वयं सृष्टि करने वाले, संगीत (सामवेद) के प्रिय, बुद्धिमान, वाणी के स्वामी और सिद्धियाँ देने वाले हैं।
श्लोक 13
दूर्वाबिल्वप्रियो…
वे दूर्वा और बिल्वपत्र प्रिय, अद्भुत रूप वाले और माता पार्वती के साथ खेलने में आनंदित रहने वाले हैं।
श्लोक 14
स्वलावण्यसुधासार…
वे अत्यंत सुंदर, कामदेव से भी अधिक आकर्षक, समस्त जगत के आधार, मायावी और मूषक (चूहे) के वाहन हैं।
श्लोक 15
हृष्टस्तुष्टः…
वे सदैव प्रसन्न रहने वाले और सभी सिद्धियाँ देने वाले हैं। इस प्रकार 108 नामों से विघ्नेश्वर की स्तुति की जाती है।
श्लोक 16–17 (फलश्रुति)
भगवान शिव ने इस स्तोत्र से गणेश जी की स्तुति की।
जो भक्त इस स्तोत्र का श्रद्धा से पाठ करता है, वह दूर्वा, बिल्वपत्र, पुष्प या चंदन से पूजा करके, सभी इच्छाएँ प्राप्त करता है
जीवन के सभी विघ्नों से मुक्त हो जाता है
श्री सिद्धिविनायक स्तोत्र के लाभ:
लाभ (Benefits): नियमित रूप से इस नामावली का पाठ करने से:
जीवन के सभी विघ्न और बाधाएं दूर होती हैं
कार्यों में सफलता और सिद्धि प्राप्त होती है
बुद्धि, ज्ञान और निर्णय क्षमता बढ़ती है
आर्थिक स्थिति में सुधार होता है
मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है
भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है
पाठ करने की विधि:
1. सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें
2. गणेश जी की मूर्ति या फोटो के सामने बैठें
3. दीपक और धूप जलाएं
4. दूर्वा, मोदक या लड्डू अर्पित करें
5. श्रद्धा से स्तोत्र का पाठ करें
पाठ करने का सही समय:
सुबह ब्रह्म मुहूर्त सबसे उत्तम
बुधवार और चतुर्थी विशेष फलदायी
किसी नए कार्य से पहले भी पाठ कर सकते हैं।
श्री सिद्धिविनायक अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करने का अत्यंत प्रभावी माध्यम है।
यदि आप नियमित रूप से इसका पाठ करते हैं, तो जीवन में सफलता, सुख और शांति अवश्य प्राप्त होती है।
