॥ भगवान गिरिधारी आरती ॥
भगवान गिरिधारी आरती भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का गुणगान करने वाली एक अत्यंत भक्तिपूर्ण आरती है। गिरिधारी नाम का अर्थ है — “गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाले”, जो श्रीकृष्ण के उस दिव्य लीला की स्मृति कराता है जिसमें उन्होंने ब्रजवासियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत उठाया था।इस आरती में श्रीकृष्ण के विभिन्न रूपों, लीलाओं और भक्तों पर की गई कृपा का सुंदर वर्णन मिलता है। यह आरती विशेष रूप से जन्माष्टमी, गोवर्धन पूजा, एकादशी तथा प्रतिदिन श्रीकृष्ण पूजन के समय गाई जाती है।
॥ भगवान गिरिधारी आरती ॥
जय जय गिरिधारी प्रभु, जय जय गिरिधारी।
दानव-दल-बलहारी, गो-द्विज-हितकारी॥
जय जय गिरिधारी प्रभु, जय जय गिरिधारी।
जय गोविन्द दयानिधि, गोवर्धन-धारी।
वंशीधर बनवारी, ब्रज-जन-प्रियकारी॥
जय जय गिरिधारी प्रभु, जय जय गिरिधारी।
गणिका-गीध-अजामिल, गजपति-भयहारी।
आर्त-आरति-हारी, जग-मंगल-कारी॥
जय जय गिरिधारी प्रभु, जय जय गिरिधारी।
गोपालक, गोपेश्वर, द्रौपदी-दुखहारी।
शबरी-सुत-सुखकारी, गौतम-तिय-तारी॥
जय जय गिरिधारी प्रभु, जय जय गिरिधारी।
प्रह्लाद-प्रमोदक, नरहरि-तनु-धारी।
जन-मन-रंजनकारी, दिति-सुत-संहारी॥
जय जय गिरिधारी प्रभु, जय जय गिरिधारी।
टिट्टिभ-सुत-संरक्षक, रक्षक-मझारी।
पाण्डु-सुवन-शुभकारी, कौरव-मद-हारी॥
जय जय गिरिधारी प्रभु, जय जय गिरिधारी।
मन्मथ-मोहन-मोहन, मुरली-रव-कारी।
वृन्दावन-विपिन-विहारी, यमुना-तट-चारी॥
जय जय गिरिधारी प्रभु, जय जय गिरिधारी।
अघ-बक-बकासुर-उधारक, तृणावर्त-तारी।
बिधि-सुरपति-मदहारी, कंस-मुक्तिकारी॥
जय जय गिरिधारी प्रभु, जय जय गिरिधारी।
शेष-महेश-सरस्वती, गुण गावत भारी।
कलि-कीर्ति-बिस्तारी, भक्त-भीति-हारी॥
जय जय गिरिधारी प्रभु, जय जय गिरिधारी।
नारायण शरणागत, अति-अघ-अघहारी।
पद-रज-पावनकारी, चाहत चितहारी॥
जय जय गिरिधारी प्रभु, जय जय गिरिधारी।
आरती का माहात्म्य:
- यह आरती भगवान श्रीकृष्ण के गोवर्धन-धारी स्वरूप की स्तुति है।
- शास्त्रीय परंपरा में संध्या आरती, गोवर्धन पूजा, जन्माष्टमी और दैनिक भजन में गाई जाती है।
- संकट, भय, बाधा और मानसिक अशांति के समय इसका गान विशेष फलदायी माना जाता है।
- “गो-द्विज-हितकारी” और “भक्त-भीति-हारी” रूप में प्रभु की करुणा का स्मरण कराती है।
सरल अर्थ (Summary Meaning)
इस आरती में भगवान गिरिधारी की स्तुति करते हुए कहा गया है कि वे दानवों का नाश करने वाले, गौ-ब्राह्मणों के रक्षक और भक्तों के कल्याणकर्ता हैं। वे गोवर्धन पर्वत उठाने वाले, मुरलीधर, ब्रजवासियों के प्रिय और करुणा के सागर हैं।
भगवान ने अजामिल, गजेंद्र, प्रह्लाद, द्रौपदी, शबरी जैसे भक्तों की रक्षा की और असुरों का संहार किया। वे भक्तों के दुःख हरने वाले, मन को आनंद देने वाले और संसार का मंगल करने वाले हैं। जो भक्त सच्चे मन से उनकी शरण में आता है, उसके सभी पाप नष्ट होते हैं और जीवन पवित्र हो जाता है।
