॥ श्री कमलापत्यष्टकम् ॥

“श्री कमलापत्यष्टकम्” भगवान विष्णु (कमलापति — अर्थात् लक्ष्मीपति) की दिव्य स्तुति है। यह स्तोत्र भक्ति, वैराग्य और जीवन की अस्थिरता का बोध कराते हुए मनुष्य को भगवान के चरणों में शरण लेने का संदेश देता है। इस स्तोत्र का नियमित पाठ जन्म-मरण के भय को दूर कर आत्मिक शांति प्रदान करता है।
॥ श्री कमलापत्यष्टकम् ॥
भुजगतल्पगतं घनसुन्दरंगरुडवाहनमम्बुजलोचनम्।
नलिनचक्रगदाकरमव्ययंभजत रे मनुजाः कमलापतिम्॥1॥
अलिकुलासितकोमलकुन्तलंविमलपीतदुकूलमनोहरम्।
जलधिजाङ्कितवामकलेवरंभजत रे मनुजाः कमलापतिम्॥2॥
किमु जपैश्च तपोभिरुताध्वरैरपिकिमुत्तमतीर्थनिषेवणैः।
किमुत शास्त्रकदम्बविलोकनैर्भजतरे मनुजाः कमलापतिम्॥3॥
मनुजदेहमिमं भुवि दुर्लभंसमधिगम्य सुरैरपि वाञ्छितम्।
विषयलम्पटतामपहाय वैभजत रे मनुजाः कमलापतिम्॥4॥
न वनिता न सुतो न सहोदरो नहि पिता जननी न च बान्धवः।
व्रजति साकमनेन जनेन वैभजत रे मनुजाः कमलापतिम्॥5॥
सकलमेव चलं सचराचरंजगदिदं सुतरां धनयौवनम्।
समवलोक्य विवेकदृशा द्रुतंभजत रे मनुजाः कमलापतिम्॥6॥
विविधरोगयुतं क्षणभंगुरंपरवशं नवमार्गमलाकुलम्।
परिनिरीक्ष्य शरीरमिदं स्वकंभजत रे मनुजाः कमलापतिम्॥7॥
मुनिवरैरनिशं हृदि भावितंशिवविरिञ्चिमहेन्द्रनुतं सदा।
मरणजन्मजराभयमोचनंभजत रे मनुजाः कमलापतिम्॥8॥
हरिपदाष्टकमेतदनुत्तमंपरमहंसजनेन समीरितम्।
पठति यस्तु समाहितचेतसाव्रजति विष्णुपदं स नरो ध्रुवम्॥9॥
॥ इति श्रीमत्परमहंसस्वामिब्रह्मानन्दविरचितं श्रीकमलापत्यष्टकं सम्पूर्णम् ॥
श्री कमलापत्यष्टकम् का माहात्म्य:
- यह स्तोत्र भगवान विष्णु की उपासना का अत्यंत प्रभावशाली माध्यम है।
- जीवन की नश्वरता और वैराग्य का बोध कराता है।
- मन को विषय-वासनाओं से हटाकर ईश्वर भक्ति की ओर ले जाता है।
- जन्म, मृत्यु और जरा (बुढ़ापा) के भय से मुक्ति का मार्ग दिखाता है।
- जो भक्त श्रद्धा से इसका पाठ करता है, उसे विष्णुपद (मोक्ष) की प्राप्ति होती है।
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सरल अर्थ:
श्लोक १ का अर्थ:-भुजगतल्पगतं घनसुन्दरं गरुडवाहनमम्बुजलोचनम्। नलिनचक्रगदाकरमव्ययं भजत रे मनुजाः कमलापतिम्॥
जो भगवान शेषनाग की शय्या पर विराजमान हैं, अत्यंत सुंदर हैं, गरुड़ जिनका वाहन है, कमल के समान नेत्र वाले हैं, और जिनके हाथों में कमल, चक्र और गदा है — उन अविनाशी लक्ष्मीपति भगवान विष्णु का भजन करो।
श्लोक २ का अर्थ:-अलिकुलासितकोमलकुन्तलं विमलपीतदुकूलमनोहरम्। जलधिजाङ्कितवामकलेवरं भजत रे मनुजाः कमलापतिम्॥
जिनके कोमल केशों पर भौंरे मंडराते हैं, जो निर्मल पीताम्बर धारण किए हुए हैं, और जिनके वक्षस्थल पर लक्ष्मी जी विराजमान हैं — उन कमलापति का भजन करो।
श्लोक ३ का अर्थ:-किमु जपैश्च तपोभिरुताध्वरैरपि किमुत्तमतीर्थनिषेवणैः। किमुत शास्त्रकदम्बविलोकनैर्भजत रे मनुजाः कमलापतिम्॥
केवल जप, तप, यज्ञ, तीर्थ या शास्त्र पढ़ने से क्या लाभ, यदि भगवान की सच्ची भक्ति नहीं है? इसलिए हे मनुष्यों! कमलापति का भजन करो।
श्लोक ४ का अर्थ:-मनुजदेहमिमं भुवि दुर्लभं समधिगम्य सुरैरपि वाञ्छितम्। विषयलम्पटतामपहाय वै भजत रे मनुजाः कमलापतिम्॥
यह मानव शरीर अत्यंत दुर्लभ है, देवता भी इसकी इच्छा करते हैं। इसलिए विषय-वासना छोड़कर भगवान विष्णु का भजन करो।
श्लोक ५ का अर्थ:-न वनिता न सुतो न सहोदरो नहि पिता जननी न च बान्धवः। व्रजति साकमनेन जनेन वै भजत रे मनुजाः कमलापतिम्॥
मृत्यु के समय न पत्नी, न पुत्र, न भाई, न माता-पिता और न कोई संबंधी साथ जाता है — केवल भगवान ही सहायक होते हैं। इसलिए उनका भजन करो।
श्लोक ६ का अर्थ:- सकलमेव चलं सचराचरं जगदिदं सुतरां धनयौवनम्। समवलोक्य विवेकदृशा द्रुतं भजत रे मनुजाः कमलापतिम्॥
यह सारा संसार, धन और यौवन सब नश्वर हैं। विवेक से विचार करके शीघ्र भगवान का भजन करो।
श्लोक ७ का अर्थ:-विविधरोगयुतं क्षणभंगुरं परवशं नवमार्गमलाकुलम्। परिनिरीक्ष्य शरीरमिदं स्वकं भजत रे मनुजाः कमलापतिम्॥
यह शरीर रोगों से युक्त, क्षणभंगुर और दूसरों पर निर्भर है। इसे देखकर भगवान की शरण में जाओ।
श्लोक ८ का अर्थ:-मुनिवरैरनिशं हृदि भावितं शिवविरिञ्चिमहेन्द्रनुतं सदा। मरणजन्मजराभयमोचनं भजत रे मनुजाः कमलापतिम्॥
जिनका ध्यान मुनि करते हैं, जिनकी स्तुति शिव, ब्रह्मा और इन्द्र भी करते हैं, जो जन्म-मरण और बुढ़ापे के भय को दूर करते हैं — उन भगवान का भजन करो।
श्लोक ९ का अर्थ:- (फलश्रुति)
हरिपदाष्टकमेतदनुत्तमं परमहंसजनेन समीरितम्।
पठति यस्तु समाहितचेतसा व्रजति विष्णुपदं स नरो ध्रुवम्॥
यह उत्तम अष्टक परमहंस स्वामी ब्रह्मानंद द्वारा रचित है। जो मन लगाकर इसका पाठ करता है, वह निश्चित रूप से विष्णु लोक को प्राप्त करता है।
