॥ आरती श्रीकृष्ण कन्हैया की आरती ॥
श्रीकृष्ण कन्हैया की यह आरती भगवान श्रीकृष्ण के बाल, माखनचोर, रासलीला करने वाले तथा गीता के उपदेशक स्वरूप की स्तुति है। इसमें उनके जन्म, बाल लीलाओं, भक्तवत्सल स्वभाव और अधर्म के नाशक रूप का सुंदर वर्णन किया गया है। यह आरती विशेष रूप से जन्माष्टमी, संध्या आरती तथा नित्य पूजा में गाई जाती है। इसके पाठ से मन में प्रेम, भक्ति और आनंद की अनुभूति होती है।
॥ आरती श्रीकृष्ण कन्हैया की ॥
मथुरा कारागृह अवतारी, गोकुल जसुदा गोद विहारी।
नन्दलाल नटवर गिरधारी, वासुदेव हलधर भैया की॥
आरती श्रीकृष्ण कन्हैया की॥
मोर मुकुट पीताम्बर छाजै, कटि काछनि कर मुरलि विराजै।
पूर्ण शरद ससि मुख लखि लाजै, काम कोटि छवि जितवैया की॥
आरती श्रीकृष्ण कन्हैया की॥
गोपीजन रस रास विलासी, कौरव कालिय कंस बिनासी।
हिमकर भानु कृसानु प्रकासी, सर्वभूत हिय बसवैया की॥
आरती श्रीकृष्ण कन्हैया की॥
कहुँ रण चढ़ै, भागि कहुँ जावै, कहुँ नृप कर, कहुँ गाय चरावै।
कहुँ जागेस, वेद जस गावै, जग नचाय ब्रज नचवैया की॥
आरती श्रीकृष्ण कन्हैया की॥
अगुण सगुण लीला बपु धारी, अनुपम गीता ज्ञान प्रचारी।
दामोदर सब विधि बलिहारी, विप्र धेनु सुर रखवैया की॥
आरती श्रीकृष्ण कन्हैया की॥
आरती का माहात्म्य:
- यह आरती श्रीकृष्ण के बाल रूप, लीलामय स्वरूप और गीता ज्ञान का स्मरण कराती है।
- जन्माष्टमी, एकादशी, गुरुवार तथा दैनिक पूजा में इसका विशेष महत्व है।
- शास्त्रों के अनुसार, भगवान के नाम और गुणों का कीर्तन करने से पाप क्षीण होते हैं और मन शुद्ध होता है।
- यह आरती भक्त को प्रेम, करुणा, धर्म और साहस का संदेश देती है।
सरल अर्थ (Summary Meaning): भगवान श्रीकृष्ण की यह पावन आरती उनके दिव्य अवतार, लीलाओं और धर्म स्थापना के कार्य का स्मरण कराती है। मथुरा के कारागृह से लेकर गोकुल की गलियों, वृंदावन के रास और कुरुक्षेत्र के धर्मयुद्ध तक — श्रीकृष्ण का जीवन भक्तों के लिए मार्गदर्शन और प्रेम का संदेश है। इस आरती का गान करने से मन में भक्ति, आनंद और आध्यात्मिक शक्ति का संचार होता है।
इस आरती में भगवान कृष्ण को मथुरा की जेल में जन्म लेने वाला और गोकुल में यशोदा मैया की गोद में खेलने वाला बताया गया है। वे मोर मुकुट और पीत वस्त्र धारण करने वाले, बंसी बजाने वाले और अपार सौंदर्य से युक्त हैं।
वे रास रचाने वाले, कालिय नाग और कंस का संहार करने वाले, सभी प्राणियों के हृदय में वास करने वाले प्रभु हैं। कभी युद्ध करते हैं, कभी गाय चराते हैं और कभी वेदों द्वारा जिनकी महिमा गाई जाती है। वे सगुण-निर्गुण दोनों रूपों में लीला करने वाले, गीता का ज्ञान देने वाले और ब्राह्मण, गाय तथा देवताओं की रक्षा करने वाले हैं।
