नमस्ते श्रीशिवाय कुलाराध्या कुलेश्वरी।
कुलसंरक्षिणी माता कौलिकज्ञानप्रकाशिनी॥


अर्थ:इसलिए, हे शिवप्रिया कुलदेवी! आपको नमस्कार है। आप हमारे कुल की आराध्य देवी और कुल की अधिष्ठात्री हैं। आप अपने भक्तों के कुल की रक्षा करने वाली और आध्यात्मिक ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाली माता हैं।

वन्दे श्रीकुलपूज्या त्वां कुलाम्बा कुलरक्षिणी।
वेदमाता जगन्माता लोकमाता हितैषिणी॥


अर्थ:इसी प्रकार, हे कुलाम्बा माता! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आप हमारे कुल की पूजनीय देवी हैं और पूरे कुल की रक्षा करने वाली हैं। आप वेदों की माता, सम्पूर्ण जगत की माता और सभी लोकों का कल्याण करने वाली देवी हैं।

आदिशक्ति समुद्भूता त्वमेव कुलस्वामिनी।
विश्ववन्द्या महाघोरा त्राहि मां शरणागतम्॥


अर्थ:वैसे, हे आदिशक्ति! आप सम्पूर्ण सृष्टि की मूल शक्ति हैं और हमारे कुल की स्वामिनी हैं। सम्पूर्ण विश्व आपको प्रणाम करता है। हे देवी! मैं आपकी शरण में आया हूँ, कृपया मेरी रक्षा करें।

त्रैलोक्यहृदयशोभे देवि त्वं परमेश्वरी।
भक्तानुग्रहकारिणी कुलदेवि नमोऽस्तुते॥


अर्थ: हे देवी! आप तीनों लोकों के हृदय को सुशोभित करने वाली परमेश्वरी हैं। आप अपने भक्तों पर कृपा करने वाली हैं। हे कुलदेवी! आपको बार-बार प्रणाम है।

महादेवप्रियंकरी बालानां हितकारिणी।
कुलवृद्धिकरी माता त्राहि मां शरणागतम्॥


अर्थ: हे महादेव की प्रिय माता! आप बच्चों और परिवार के हित का ध्यान रखने वाली हैं। आप हमारे कुल की उन्नति करने वाली माता हैं। मैं आपकी शरण में हूँ, कृपया मेरी रक्षा करें।

चिदग्निमण्डलसम्भूता राज्यवैभवकारिणी।
प्रकटीता सुरेशानि वन्दे त्वां कुलगौरवाम्॥


अर्थ: हे देवी! आप दिव्य चेतना की अग्नि से प्रकट हुई हैं और राज्य, वैभव तथा समृद्धि देने वाली हैं। देवताओं की अधिष्ठात्री देवी! आप हमारे कुल का गौरव हैं, मैं आपको प्रणाम करता हूँ।

त्वदीये कुले जातः त्वामेव शरणं गतः।
त्वद्वत्सलोऽहं आद्ये त्वं रक्ष रक्षाधुना॥


अर्थ: हे आदिशक्ति! चूंकि मैं आपके ही कुल में जन्मा हूँ और आपकी ही शरण में आया हूँ। मैं आपका भक्त और आपका स्नेह चाहने वाला हूँ, इसलिए कृपया मेरी रक्षा करें।

कुलाष्टकमिदं पुण्यं नित्यं यः सुकृतिः पठेत्।
तस्य वृद्धिः कुले नित्यं प्रसन्ना कुलेश्वरी॥

कुलाष्टकमिदं पुण्यं नित्यं यः सुकृतिः पठेत्।
तस्य वृद्धिः कुले नित्यं प्रसन्ना कुलेश्वरी॥
अर्थ: इसी प्रकार, जो पुण्यवान व्यक्ति इस कुलदेवी स्तोत्र (कुलाष्टक) का प्रतिदिन पाठ करता है, उसके कुल की उन्नति होती है और कुलदेवी सदैव उस पर प्रसन्न रहती हैं।

कुलदेवी स्तोत्रमिदं सुपुण्यं ललितं तथा।
अर्पयामि भवत्यै भक्त्या त्राहि मां शिवगेहिनि॥


अर्थ: यह पवित्र और सुंदर कुलदेवी स्तोत्र मैं आपकी भक्ति से आपको समर्पित करता हूँ। हे शिव की अर्धांगिनी माता! कृपया मेरी रक्षा करें।

प्रणम्य शिरसा देवं गौरीविनायकम्।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यं आयुः कामार्थसिद्धये॥


अर्थ: सिर झुकाकर भगवान शिव, माता गौरी और श्री गणेश को प्रणाम करके जो भक्त उनका प्रतिदिन स्मरण करता है, उसे दीर्घायु, सुख और मनोकामनाओं की सिद्धि प्राप्त होती है।

भावार्थ:

यह स्तोत्र कुलदेवी की स्तुति और शरणागति का पवित्र पाठ है। श्रद्धा से इसका पाठ करने से कुल की रक्षा, उन्नति, सुख-समृद्धि और देवी की कृपा प्राप्त होती है।

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