॥ परमेश्वर स्तुति स्तोत्रम् ॥

“परमेश्वर स्तुति स्तोत्रम्” एक अत्यंत गूढ़ और अद्वैत भाव से युक्त स्तुति है, जिसमें जीव और ब्रह्म की एकता, संसार से वैराग्य, तथा मोक्ष की कामना का सुंदर वर्णन मिलता है।इस प्रकार यह स्तोत्र साधक को आत्मज्ञान, शांति और परम सत्य की ओर अग्रसर करता है।
इसमें भक्त परमेश्वर से करुणा, कृपा और आत्मतत्त्व के बोध की याचना करता है।
॥ परमेश्वर स्तुति स्तोत्रम् ॥
त्वमेकः शुद्धोऽसि त्वयि निगमबाह्या मलमयं
प्रपञ्चं पश्यन्ति भ्रमपरवशाः पापनिरताः।
बहिस्तेभ्यः कृत्वा स्वपदशरणं मानय विभो
गजेन्द्रे दृष्टं ते शरणद वदान्यं स्वपददम्॥1॥
न सृष्टेस्ते हानिर्यदि हि कृपयातोऽवसि च मां
त्वयानेके गुप्ता व्यसनमिति तेऽस्ति श्रुतिपथे।
अतो मामुद्धर्तुं घटय मयि दृष्टि सुविमलां
न रिक्तां मे याच्ञां स्वजनरत कर्तुं भव हरे॥2॥
कदाहं भो स्वामिन्नियतमनसा त्वां हृदि
भजन्नभद्रे संसारे ह्यनवरतदुःखेऽतिविरसः।
लभेयं तां शान्तिं परममुनिभिर्या ह्यधिगता
दयां कृत्वा मे त्वं वितर परशान्तिं भवहर॥3॥
विधाता चेद्विश्वं सृजति सृजतां मे शुभकृतिं
विधुश्चेत्पाता मावतु जनिमृतेर्दुःखजलधेः।
हरः संहर्ता संहरतु मम शोकं सजनकं
यथाहं मुक्तः स्यां किमपि तु तथा ते विदधताम्॥4॥
अहं ब्रह्मानन्दस्त्वमपि च तदाख्यः सुविदित
स्ततोऽहं भिन्नो नो कथमपि भवत्तः श्रुतिदृशा।
तथा चेदानीं त्वं त्वयि मम विभेदस्य जननीं
स्वमायां संवार्य प्रभव मम भेदं निरसितुम्॥5॥
कदाहं हे स्वामिञ्जनिमृतिमयं दुःखनिबिडं
भवं हित्वा सत्येऽनवरतसुखे स्वात्मवपुषि।
रमे तस्मिन्नित्यं निखिलमुनयो ब्रह्मरसिका
रमन्ते यस्मिंस्ते कृतसकलकृत्या यतिवरा॥6॥
पठन्त्येके शास्त्रं निगममपरे तत्परतया
यजन्त्यन्ये त्वां वै ददति च पदार्थांस्तव हितान्।
अहं तु स्वामिंस्ते शरणमगमं संसृतिभयाद्यथा
ते प्रीतिः स्याद्धितकर तथा त्वं कुरु विभो॥7॥
अहं ज्योतिर्नित्यो गगनमिव तृप्तः सुखमयः
श्रुतौ सिद्धोऽद्वैतः कथमपि न भिन्नोऽस्मि विधुतः।
इति ज्ञाते तत्त्वे भवति च परः संसृतिलया
दतस्तत्त्वज्ञानं मयि सुघटयेस्त्वं हि कृपया॥8॥
अनादौ संसारे जनिमृतिमये दुःखितमना
मुमुक्षुः सन्कश्चिद्भजति हि गुरुं ज्ञानपरमम्।
ततो ज्ञात्वा यं वै तुदति न पुनः क्लेशनिवहै
भजेऽहं तं देवं भवति च परो यस्य भजनात्॥9॥
विवेको वैराग्यो न च शमदमाद्याः षडपरे
मुमुक्षा मे नास्ति प्रभवति कथं ज्ञानममलम्।
अतः संसाराब्धेस्तरणसरणिं मामुपदिशन्
स्वबुद्धिं श्रौतीं मे वितर भगवंस्त्वं हि कृपया॥10॥
कदाहं भो स्वामिन्निगममतिवेद्यं शिवमयं
चिदानन्दं नित्यं श्रुतिहृतपरिच्छेदनिवहम्।
त्वमर्थाभिन्नं त्वामभिरम इहात्मन्यविरतं
मनीषामेवं मे सफलय वदान्य स्वकृपया॥11॥
यदर्थं सर्वं वै प्रियमसुधनादि प्रभवति
स्वयं नान्यार्थो हि प्रिय इति च वेदे प्रविदितम्।
स आत्मा सर्वेषां जनिमृतिमतां वेदगदित
स्ततोऽहं तं वेद्यं सततममलं यामि शरणम्॥12॥
मया त्यक्तं सर्वं कथमपि भवेत्स्वात्मनि मतिस्त्वदीया
माया मां प्रति तु विपरीतं कृतवती।
ततोऽहं किं कुर्यां न हि मम मतिः क्वापि चरति
दयां कृत्वा नाथ स्वपदशरणं देहि शिवदम्॥13॥
नगा दैत्याः कीशा भवजलधिपारं हि गमितास्त्वया
चान्ये स्वामिन्किमिति समयेऽस्मिञ्छयितवान्।
न हेलां त्वं कुर्यास्त्वयि निहितसर्वे मयि विभो
न हि त्वाहं हित्वा कमपि शरणं चान्यमगमम्॥14॥
अनन्ताद्या विज्ञा न गुणजलधेस्तेऽन्तमगमन्नतः
न पारं यायात्तव गुणगणानां कथमयम्।
गुणवद्धि त्वां जनिमृतिहरं याति परमां
गतिं योगिप्राप्यामिति मनसि बुद्ध्वाहमनवम्॥15॥
॥ इति श्रीमन्मौक्तिकरामोदासीनशिष्यब्रह्मानन्दविरचितं
परमेश्वरस्तुतिसारस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
परमेश्वर स्तुति स्तोत्रम् माहात्म्य:
- यह स्तोत्र अद्वैत वेदांत की भावना पर आधारित है।
- आत्मा और परमात्मा की अभिन्नता को स्पष्ट करता है।
- संसार के दुःख, जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति का मार्ग दिखाता है।
- वैराग्य, विवेक और मोक्ष की इच्छा को जागृत करता है।
- नियमित पाठ से मन को शांति और आत्मबल प्राप्त होता है। इसलिए यह विशेष रूप से उन साधकों के लिए है जो आध्यात्मिक उन्नति और आत्मज्ञान की खोज में हैं।
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सरल अर्थ: यह स्तोत्र भगवान परमेश्वर (शिव) की स्तुति है, जिसमें भक्त आत्मज्ञान, मोक्ष और ईश्वर की कृपा की प्रार्थना करता है। नीचे प्रत्येक का सरल भावार्थ दिया गया है:
1 श्लोक- भावार्थ:हे प्रभु! आप ही एकमात्र शुद्ध और पवित्र हैं। अज्ञानवश लोग इस संसार को सत्य मानते हैं। जैसे आपने गजेन्द्र को बचाया, वैसे ही मुझे भी अपने चरणों की शरण देकर उद्धार करें।
2 श्लोक-भावार्थ:यदि आप कृपा कर मुझे बचाएँ तो आपकी सृष्टि में कोई कमी नहीं आएगी। अनेक लोगों की रक्षा आपने की है, यह वेदों में कहा गया है। इसलिए मुझ पर भी अपनी पवित्र दृष्टि डालकर मेरा उद्धार करें।
3 श्लोक-भावार्थ:हे स्वामी! कब मैं एकाग्र मन से आपको हृदय में धारण कर इस दुःखमय संसार से मुक्त होकर वही परम शांति प्राप्त करूँगा जो महान ऋषियों ने पाई है?
4 श्लोक-भावार्थ:यदि ब्रह्मा सृष्टि रचते हैं, विष्णु पालन करते हैं और शिव संहार करते हैं — तो वे मेरे दुःखों का भी नाश करें, जिससे मैं मुक्त हो सकूँ।
5 श्लोक-भावार्थ:मैं ब्रह्मानंद स्वरूप हूँ और आप भी वही परम तत्व हैं। वास्तव में हममें कोई भेद नहीं है। हे प्रभु! अपनी माया को दूर कर मेरे अज्ञान का नाश करें।
6 श्लोक-भावार्थ:कब मैं जन्म-मरण के दुःखों से मुक्त होकर अपने आत्मस्वरूप के नित्य आनंद में स्थित होऊँगा, जहाँ महान मुनि सदा रमण करते हैं?
7 श्लोक-भावार्थ:कुछ लोग शास्त्र पढ़ते हैं, कुछ यज्ञ करते हैं। परंतु मैं तो केवल आपकी शरण में आया हूँ। आप जो उचित समझें वही मेरे लिए करें।
8 श्लोक-भावार्थ:मैं नित्य, प्रकाशमय और अद्वैत स्वरूप हूँ। जब यह सत्य ज्ञान होता है तब संसार का बंधन समाप्त हो जाता है। कृपा कर मुझे यह ज्ञान प्रदान करें।
9 श्लोक-भावार्थ:जो व्यक्ति जन्म-मरण से दुखी होकर गुरु की शरण लेता है, वह ज्ञान पाकर फिर क्लेशों से मुक्त हो जाता है। मैं भी उसी परम देव की भक्ति करता हूँ।
10 श्लोक-भावार्थ:मेरे भीतर न विवेक है, न वैराग्य और न ही शम-दम आदि गुण। हे प्रभु! कृपा कर मुझे इस संसार-सागर से पार होने का मार्ग दिखाएँ।
11 श्लोक-भावार्थ:हे प्रभु! आप चिदानंद, नित्य और अविभाज्य ब्रह्म हैं। मेरी बुद्धि को ऐसा बनाइए कि मैं निरंतर आपको ही अपने आत्मा में अनुभव करूँ।
12 श्लोक-भावार्थ:संसार की हर वस्तु इसलिए प्रिय है क्योंकि वह आत्मा से जुड़ी है। वही आत्मा परम सत्य है। मैं उसी शुद्ध आत्मा की शरण लेता हूँ।
13 श्लोक-भावार्थ:मैंने सब त्याग दिया है, फिर भी आपकी माया मुझे भ्रमित करती है। हे नाथ! कृपा कर मुझे अपने चरणों की शरण दें।
14 श्लोक-भावार्थ:देवता, दैत्य और वानर सभी आपकी कृपा से संसार-सागर पार हुए। फिर मैं क्यों वंचित रहूँ? मैंने आपके सिवा किसी और की शरण नहीं ली।
15 श्लोक-भावार्थ:आपके गुण अनंत हैं। योगीजन आपके भजन से जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर परम गति प्राप्त करते हैं। मैं भी उसी विश्वास से आपकी शरण में हूँ।
समग्र सार- यह स्तोत्र आत्मज्ञान, अद्वैत दर्शन और परम शांति की प्रार्थना है। इस प्रकार भक्त भगवान शिव से प्रार्थना करता है कि वे माया का आवरण हटाकर उसे आत्मस्वरूप का अनुभव कराएँ और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त करें।
