॥ अथ श्रीपरशुरामाष्टकम् ॥

भगवान परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं। वे ब्राह्मण तेज, तप, शौर्य और धर्मरक्षा के प्रतीक हैं। श्रीपरशुरामाष्टकम् उनका स्तुतिगान है, जिसमें उनके दिव्य स्वरूप, पराक्रम और करुणा का वर्णन किया गया है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भय, अन्याय और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है तथा जीवन में साहस और धर्मनिष्ठा की वृद्धि होती है।
॥ अथ श्रीपरशुरामाष्टकम् ॥
शुभ्रदेहं सदा क्रोधरक्तेक्षणं
भक्तपालं कृपालुं कृपावारिधिम्।
विप्रवंशावतंसं धनुर्धारिणं
भव्ययज्ञोपवीतं कलाकारिणम्।
यस्य हस्ते कुठारं महातीक्ष्णकं
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे॥१॥
सौम्यरूपं मनोज्ञं सुरैर्वन्दितं
जन्मतः ब्रह्मचारिव्रते सुस्थितम्।
पूर्णतेजस्विनं योगयोगीश्वरं
पापसन्तापरोगादिसंहारिणम्।
दिव्यभव्यात्मकं शत्रुसंहारकं
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे॥२॥
ऋद्धिसिद्धिप्रदाता विधाता भुवो
ज्ञानविज्ञानदाता प्रदाता सुखम्।
विश्वधाता सुत्राता अखिलं विष्टपं
तत्त्वज्ञाता सदा पातु मां निर्बलम्।
पूज्यमानं निशानाथभासं विभुं
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे॥३॥
दुःखदारिद्र्यदावाग्नये तोयदं
बुद्धिजाड्यविनाशाय चैतन्यदम्।
वित्तमैश्वर्यदानाय वित्तेश्वरं
सर्वशक्तिप्रदानाय लक्ष्मीपतिम्।
मङ्गलं ज्ञानगम्यं जगत्पालकं
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे॥४॥
यश्च हन्ता सहस्रार्जुनं हैहयं
त्रिःसप्तकृत्वा महाक्रोधनैः।
दुष्टशून्या धरा येन सत्यं कृता
दिव्यदेहं दयादानदेवं भजे।
घोररूपं महातेजसं वीरकं
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे॥५॥
मारयित्वा महादुष्टभूपालकान्
येन शोणेन कुण्डे कृतं तर्पणम्।
येन शोणीकृता शोणनाम्नी नदी
स्वस्य देशस्य मूढा हता द्रोहिणः।
स्वस्य राष्ट्रस्य शुद्धिः कृता शोभना
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे॥६॥
दीनत्राता प्रभो पाहि मां पालक
रक्ष संसाररक्षाविधौ दक्षक।
देहि सम्मोहिनी भाविनी पावनीं
स्वीयपादारविन्दस्य सेवा पराम्।
पूर्णमारुण्यरूपं परं मञ्जुलं
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे॥७॥
ये जयोद्घोषकाः पादसम्पूजकाः
सत्वरं वाञ्छितं ते लभन्ते नराः।
देहगेहादिसौख्यं परं प्राप्य वै
दिव्यलोकं तथान्ते प्रियं यान्ति ते।
भक्तसंरक्षकं विश्वसम्पालकं
रेणुकानन्दनं जामदग्न्यं भजे॥८॥
॥ इति श्रीपरशुरामाष्टकं सम्पूर्णम् ॥
श्रीपरशुरामाष्टकम् माहात्म्य:
- शास्त्रों के अनुसार भगवान परशुराम अधर्म और अन्याय के विनाशक हैं। उन्होंने सहस्रार्जुन जैसे अत्याचारी राजाओं का संहार कर पृथ्वी को दुष्टों से मुक्त किया। श्रीपरशुरामाष्टकम् के नियमित पाठ से –
- शत्रु बाधा दूर होती है
- साहस और आत्मबल बढ़ता है
- ऋण, कष्ट और अन्याय से रक्षा मिलती है
- धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है
- विशेष रूप से अक्षय तृतीया (परशुराम जयंती) के दिन इसका पाठ अत्यंत फलदायी माना जाता है।
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सरल अर्थ:
श्लोक १ का अर्थ:- भगवान परशुराम शुभ्र (गौर) देह वाले हैं, जिनकी आँखें धर्म के लिए क्रोध से लाल रहती हैं। वे भक्तों की रक्षा करने वाले, दयालु और कृपा के सागर हैं। वे ब्राह्मण कुल के आभूषण हैं, धनुष धारण करने वाले हैं और यज्ञोपवीत से सुशोभित हैं। जिनके हाथ में तीक्ष्ण परशु (कुठार) है, उन रेणुका के पुत्र जमदग्नि नंदन की मैं वंदना करता हूँ।
श्लोक २ का अर्थ:- वे सौम्य और मनोहर रूप वाले हैं, देवताओं द्वारा पूजित हैं। जन्म से ही ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने वाले हैं। वे पूर्ण तेजस्वी, योगियों के भी ईश्वर, पाप, संताप और रोगों का नाश करने वाले हैं। ऐसे दिव्य और शत्रु संहारक परशुराम की मैं भक्ति करता हूँ।
श्लोक ३ का अर्थ:- वे ऋद्धि-सिद्धि देने वाले, संसार के विधाता, ज्ञान और विज्ञान के दाता तथा सुख प्रदान करने वाले हैं। वे संपूर्ण विश्व के धारणकर्ता और रक्षक हैं। वे तत्त्वज्ञानी प्रभु मुझे निर्बल अवस्था में भी सदा रक्षा करें। ऐसे चंद्रमा के समान प्रकाशमान विभु परशुराम को मैं प्रणाम करता हूँ।
श्लोक ४ का अर्थ:- वे दुःख और दरिद्रता रूपी अग्नि को शांत करने वाले मेघ के समान हैं। बुद्धि की जड़ता को नष्ट कर चेतना प्रदान करते हैं। धन और ऐश्वर्य देने वाले, सभी शक्तियाँ प्रदान करने वाले हैं। वे मंगलमय, ज्ञान से प्राप्त होने वाले और जगत के पालनकर्ता हैं।
श्लोक ५ का अर्थ:- उन्होंने सहस्रार्जुन जैसे अत्याचारी राजा का संहार किया और पृथ्वी को २१ बार दुष्टों से मुक्त किया। उन्होंने धरती को पापियों से रहित कर धर्म की स्थापना की। वे घोर रूप वाले, महान तेजस्वी और वीर हैं। ऐसे रेणुका नंदन की मैं स्तुति करता हूँ।
श्लोक ६ का अर्थ:- उन्होंने दुष्ट राजाओं का वध कर उनके रक्त से तर्पण किया और शोण नदी को लाल कर दिया। अपने देश से द्रोहियों का नाश कर राष्ट्र को शुद्ध और पवित्र बनाया। ऐसे धर्मरक्षक परशुराम को मैं प्रणाम करता हूँ।
श्लोक ७ का अर्थ:- हे प्रभु! आप दीनों के रक्षक हैं, मुझे संसार से बचाएँ। मुझे आपके चरणकमलों की सेवा का अवसर दें। आपका अरुण (लालिमा युक्त) सुंदर और मनोहर रूप सदा मेरे हृदय में बसता रहे।
श्लोक ८ का अर्थ:- जो लोग आपके जयघोष करते हैं और चरणों की पूजा करते हैं, वे शीघ्र ही इच्छित फल प्राप्त करते हैं। वे इस लोक में सुख भोगकर अंत में दिव्य लोक को प्राप्त होते हैं। ऐसे भक्तों के रक्षक और विश्व के पालनकर्ता परशुराम को मैं नमन करता हूँ।
यह अष्टक भगवान परशुराम के तेज, शौर्य, धर्मरक्षा, करुणा और भक्त संरक्षण का स्तुतिगान है। इसका पाठ साहस, धर्मनिष्ठा और आत्मबल प्रदान करता है।
