॥ श्री विन्ध्येश्वरी माता जी की आरती ॥

माँ विन्ध्येश्वरी देवी को आदिशक्ति का दिव्य स्वरूप माना जाता है। उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर स्थित विंध्याचल धाम में माँ का प्रसिद्ध मंदिर है, जहाँ लाखों भक्त दर्शन के लिए आते हैं।
“श्री विन्ध्येश्वरी माता जी की आरती” भक्तों द्वारा माता की स्तुति में गाई जाती है। इस आरती के गान से माँ की कृपा प्राप्त होती है, भय और संकट दूर होते हैं तथा जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
॥ श्री विन्ध्येश्वरी माता जी की आरती ॥
जय विन्ध्येश्वरी माता, मैया जय विन्ध्येश्वरी माता॥
सुन मेरी देवी पर्वतवासिनि, तेरा पार न पाया।
पान सुपारी ध्वजा नारियल, ले तेरी भेंट चढ़ाया॥
जय विन्ध्येश्वरी माता, मैया जय विन्ध्येश्वरी माता॥
सुवा चोली तेरे अंग विराजै, केशर तिलक लगाया।
नंगे पांव अकबर आया, सोने का छत्र चढ़ाया॥
जय विन्ध्येश्वरी माता, मैया जय विन्ध्येश्वरी माता॥
ऊँचे ऊँचे पर्वत बना देवालय, नीचे शहर बसाया।
सत्युग त्रेता द्वापर मध्ये, कलयुग राज सवाया॥
जय विन्ध्येश्वरी माता, मैया जय विन्ध्येश्वरी माता॥
धूप दीप नैवेद्य आरती, मोहन भोग लगाया।
ध्यानू भगत मैया तेरा गुण गावैं, मन वांछित फल पाया॥
जय विन्ध्येश्वरी माता, मैया जय विन्ध्येश्वरी माता॥
श्री विन्ध्येश्वरी माता जी की आरती का माहात्म्य:
- विन्ध्येश्वरी माता की आरती भक्तों के लिए अत्यंत शुभ और मंगलकारी मानी जाती है।
- यह आरती माँ दुर्गा के विंध्याचल स्वरूप की स्तुति है।
- आरती गाने से भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
- घर और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और शांति आती है।
- नवरात्रि, अष्टमी, शुक्रवार और विशेष पर्वों में इसका पाठ विशेष फलदायी माना गया है।
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विन्ध्येश्वरी माता की आरती का सरल अर्थ:
- सुन मेरी देवी पर्वतवासिनि, तेरा पार न पाया
- हे पर्वतों में निवास करने वाली माता! आपकी महिमा का कोई अंत नहीं है।
- पान सुपारी ध्वजा नारियल, ले तेरी भेंट चढ़ाया
- भक्त श्रद्धा से पान, सुपारी, ध्वज और नारियल अर्पित करते हैं।
- सुवा चोली तेरे अंग विराजै, केशर तिलक लगाया
- माँ सुंदर वस्त्र और केसर के तिलक से सुसज्जित हैं।
- नंगे पांव अकबर जाकर, सोने का छत्र चढ़ाया
- इतिहास में कहा जाता है कि सम्राट अकबर भी माता के दर्शन के लिए आए और सोने का छत्र अर्पित किया।
- ऊँचे ऊँचे पर्वत बना देवालय, नीचे शहर बसाया
- माँ का मंदिर ऊँचे पर्वत पर है और नीचे भक्तों का नगर बसा है।
- धूप दीप नैवेद्य आरती, मोहन भोग लगाया
- भक्त धूप, दीप और भोग अर्पित कर माँ की आरती करते हैं।
- ध्यानू भगत मैया गुण गावैं, मन वांछित फल पाया
- भक्त ध्यानू ने माँ की भक्ति की और उन्हें मनचाहा फल प्राप्त हुआ।
