विन्ध्येश्वरी माता की आरती का सरल अर्थ:

  • सुन मेरी देवी पर्वतवासिनि, तेरा पार न पाया
  • हे पर्वतों में निवास करने वाली माता! आपकी महिमा का कोई अंत नहीं है।
  • पान सुपारी ध्वजा नारियल, ले तेरी भेंट चढ़ाया
  • भक्त श्रद्धा से पान, सुपारी, ध्वज और नारियल अर्पित करते हैं।
  • सुवा चोली तेरे अंग विराजै, केशर तिलक लगाया
  • माँ सुंदर वस्त्र और केसर के तिलक से सुसज्जित हैं।
  • नंगे पांव अकबर जाकर, सोने का छत्र चढ़ाया
  • इतिहास में कहा जाता है कि सम्राट अकबर भी माता के दर्शन के लिए आए और सोने का छत्र अर्पित किया।
  • ऊँचे ऊँचे पर्वत बना देवालय, नीचे शहर बसाया
  • माँ का मंदिर ऊँचे पर्वत पर है और नीचे भक्तों का नगर बसा है।
  • धूप दीप नैवेद्य आरती, मोहन भोग लगाया
  • भक्त धूप, दीप और भोग अर्पित कर माँ की आरती करते हैं।
  • ध्यानू भगत मैया गुण गावैं, मन वांछित फल पाया
  • भक्त ध्यानू ने माँ की भक्ति की और उन्हें मनचाहा फल प्राप्त हुआ।

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