॥ श्री यमुनाष्टकम् ॥

श्री यमुनाष्टकम् माँ यमुना की दिव्य स्तुति है, जिसमें उनकी पवित्रता, कृपा और मोक्षदायिनी शक्ति का वर्णन किया गया है। यह स्तोत्र आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है और इसका पाठ मन, वचन और कर्म की शुद्धि के लिए अत्यंत फलदायी बताया गया है। जो भक्त श्रद्धा से इसका पाठ करता है, उसके पाप नष्ट होते हैं और भक्ति में वृद्धि होती है।
॥ श्रीयमुनाष्टकम् ॥
मुरारिकायकालिमाललामवारिधारिणीतृणीकृतत्रिविष्टपा त्रिलोकशोकहारिणी।
मनोऽनुकूलकूलकुञ्जपुञ्जधूतदुर्मदाधुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥1॥
मलापहारिवारिपूरभूरिमण्डितामृताभृशं प्रपातकप्रवञ्चनातिपण्डितानिशम्।
सुनन्दनन्दनाङ्ग-सङ्गरागरञ्जिता हिताधुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥2॥
लसत्तरङ्गसङ्गधूतभूतजातपातकानवीनमाधुरीधुरीणभक्तिजातचातका।
तटान्तवासदासहंससंसृता हि कामदाधुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥3॥
विहाररासखेदभेदधीरतीरमारुतागता गिरामगोचरे यदीयनीरचारुता।
प्रवाहसाहचर्यपूतमेदिनीनदीनदाधुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥4॥
तरङ्गसङ्गसैकताञ्चितान्तरा सदासिताशरन्निशाकरांशुमञ्जुमञ्जरीसभाजिता।
भवार्चनाय चारुणाम्बुनाधुना विशारदाधुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥5॥
जलान्तकेलिकारिचारुराधिकाङ्गरागिणीस्वभर्तुरन्यदुर्लभाङ्गसङ्गतांशभागिनी।
स्वदत्तसुप्तसप्तसिन्धुभेदनातिकोविदाधुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥6॥
जलच्युताच्युताङ्गरागलम्पटालिशालिनीविलोलराधिकाकचान्तचम्पकालिमालिनी।
सदावगाहनावतीर्णभर्तृभृत्यनारदाधुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥7॥
सदैव नन्दनन्दकेलिशालिकुञ्जमञ्जुलातटोत्थफुल्लमल्लिकाकदम्बरेणुसूज्ज्वला।
जलावगाहिनां नृणां भवाब्धिसिन्धुपारदाधुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥8॥
॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीयमुनाष्टकं सम्पूर्णम् ॥
श्रीयमुनाष्टकम् माहात्म्य:
- माँ यमुना को त्रिलोक शोक हारिणी कहा गया है — तीनों लोकों के दुखों का नाश करने वाली।
- यह स्तोत्र पापों का क्षय करता है और अंतःकरण को निर्मल बनाता है।
- श्रीकृष्ण की लीला भूमि से जुड़ी होने के कारण यह भक्ति और प्रेम की भावना को जागृत करता है।
- शास्त्रों के अनुसार यमुना स्तुति का नियमित पाठ करने से जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
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सरल अर्थ:
१. हे कलिन्दनन्दिनी (यमुना माता)! आप त्रिलोक के शोकों को हरने वाली हैं। कृपया मेरे मन के मल (दोषों) को दूर करें।
२. आपका जल पापों को नष्ट करने वाला और अमृत के समान पवित्र है। श्रीकृष्ण के संग से रंजित होकर आप भक्तों को पावन करती हैं।
३. आपकी तरंगें जीवों के पाप धो देती हैं और भक्तों की भक्ति को नवीन माधुर्य प्रदान करती हैं।
४. आपकी धारा पृथ्वी को पवित्र करती है और जिनका आप संग करती हैं, उन्हें दिव्यता प्रदान करती हैं।
५. आपके तट चंद्रमा की किरणों से सुशोभित हैं और आपका जल भक्ति तथा मोक्ष प्रदान करने वाला है।
६. आप श्रीकृष्ण की प्रिय हैं और उनके स्पर्श से पवित्र हैं। आपका स्मरण मन को शुद्ध करता है।
७. जो भक्त आपके जल में स्नान करते हैं, वे पवित्र होकर भगवान की कृपा प्राप्त करते हैं।
८. आपके तट श्रीकृष्ण की लीलाओं से पवित्र हैं। आपका स्मरण संसार सागर से पार लगाने वाला है।
